बिहार रैयती भूमि क्रय नीति 2026 किसानों के हितों के खिलाफ, सरकार इसे तत्काल वापस ले- सांसद सुधाकर सिंह

 संवाददाता पिंटु कुमार तिवारी की रिपोर्ट

दुर्गावती(कैमूर)--- बक्सर लोकसभा क्षेत्र के सांसद सुधाकर सिंह ने बिहार सरकार द्वारा लागू "बिहार रैयती भूमि क्रय नीति, 2026" का कड़ा विरोध करते हुए इसे किसानों के हितों के विरुद्ध बताया है। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस नीति को तत्काल प्रभाव से वापस लेने अथवा स्थगित करने की मांग की है।

सांसद ने कहा कि बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है, जहां भूमि केवल संपत्ति नहीं बल्कि करोड़ों किसानों की आजीविका, सामाजिक सम्मान और उनके भविष्य का आधार है। ऐसे में यदि निजी कंपनियों और बड़े पूंजीपतियों को सरकारी तंत्र के माध्यम से बड़े पैमाने पर रैयती भूमि खरीदने की सुविधा दी जाती है, तो इससे किसानों की आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और कृषि व्यवस्था पर दूरगामी व गंभीर दुष्प्रभाव पड़ेंगे।

उन्होंने कहा कि यह नीति भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 की मूल भावना के विपरीत प्रतीत होती है। उन्होंने कहा कि अधिनियम की धारा 46 के तहत निजी कंपनियों द्वारा भूमि खरीद की स्थिति में पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (आर एंड आर) की व्यवस्था अनिवार्य है, लेकिन राज्य सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इसके लिए कौन-सी नियमावली, मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) अथवा प्रशासनिक व्यवस्था बनाई गई है। यदि इन प्रावधानों का पालन सुनिश्चित नहीं किया गया तो भविष्य में इस नीति के तहत होने वाले भूमि क्रय कानूनी विवादों का कारण बन सकते हैं।

सुधाकर सिंह ने कहा कि अधिनियम की धारा 46(5) राज्य सरकार को निजी कंपनियों द्वारा खरीदी जाने वाली भूमि की अधिकतम सीमा तय करने का अधिकार देती है, लेकिन नई नीति में इस संबंध में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया है। उन्होंने आशंका जताई कि यदि भूमि खरीद की अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं की गई तो बड़े कॉरपोरेट समूह हजारों एकड़ कृषि भूमि खरीदकर भूमि के असमान वितरण को बढ़ावा देंगे और किसानों के विस्थापन की स्थिति पैदा हो सकती है।

उन्होंने यह भी कहा कि नीति में भूमि मूल्य निर्धारण के लिए केवल निबंधन विभाग की दरों अथवा पूर्व के विक्रय विलेखों को आधार बनाया गया है, जबकि किसानों को उनकी भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य, वर्तमान उपयोग और भविष्य की संभावनाओं के अनुरूप उचित प्रतिकर मिलना चाहिए।

सांसद ने कहा कि भूमि की प्रकृति एवं श्रेणी का निर्धारण केवल निबंधन विभाग के अभिलेखों के आधार पर करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि राज्य के कई क्षेत्रों में राजस्व अभिलेखों और भूमि के वास्तविक उपयोग में अंतर है। इससे किसानों के साथ अन्याय होने और विवाद बढ़ने की आशंका बनी रहेगी।

उन्होंने सरकार से सवाल किया कि इस नीति से राज्य सरकार, किसानों अथवा आम जनता को क्या प्रत्यक्ष लाभ होगा। इसके विपरीत, आशंका है कि बिहार की उपजाऊ कृषि भूमि धीरे-धीरे निजी कंपनियों और बड़े कॉरपोरेट घरानों के नियंत्रण में चली जाएगी, जिससे आर्थिक असमानता, ग्रामीण विस्थापन और सामाजिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

सुधाकर सिंह ने कहा कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 की धारा 2(2) के अनुसार निजी कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण अथवा अधिग्रहण जैसी प्रक्रिया में कम-से-कम 80 प्रतिशत प्रभावित परिवारों की पूर्व सहमति आवश्यक है। उन्होंने सरकार से स्पष्ट करने की मांग की कि नई नीति के तहत इस वैधानिक प्रावधान का पालन किस प्रकार सुनिश्चित किया जाएगा।

सांसद ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि किसानों के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए बिहार रैयती भूमि क्रय नीति, 2026 को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए अथवा स्थगित किया जाए। साथ ही किसान संगठनों, कृषि एवं विधि विशेषज्ञों, जनप्रतिनिधियों तथा नागरिक समाज के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद नई नीति बनाई जाए, ताकि किसानों के अधिकारों, आजीविका और कृषि भूमि की समुचित सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

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