जिसकी राज उसकी दुहाई आगे कहकर सता चलाते नेता
- सुनील कुमार, जिला ब्यूरो चीफ रोहतास
- Jun 17, 2026
- 3 views
रोहतास ।सत्ता के गलियारों से जब यह आवाज़ आती है कि अगले 20-30 साल तक हम ही राज करेंगे, तब सवाल सिर्फ एक राजनीतिक बयान का नहीं रह जाता, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर खड़े सबसे बड़े प्रश्न का बन जाता है। आखिर किसी लोकतंत्र में कोई दल भविष्य की तीन दशक लंबी सत्ता का भरोसा कैसे जता सकता है? क्या जनता का जनादेश पहले ही लिख दिया गया है? क्या चुनाव अब केवल औपचारिकता भर रह गए हैं?
लोकतंत्र में जनता मालिक होती है, लेकिन आज ऐसा लगता है कि मालिक को सिर्फ पांच साल में एक दिन बुलाया जाता है और बाकी समय उसे दर्शक दीर्घा में बैठा दिया जाता है। संसद में बहस कम, आदेश ज्यादा सुनाई देते हैं। विपक्ष की आवाज़ कम और एजेंसियों की दस्तक ज्यादा सुनाई देती है।
सवाल यह है कि देश में विपक्षी सरकारें क्यों गिरती हैं, लेकिन सत्ता पक्ष की सरकारें कभी नहीं गिरतीं? विपक्ष के विधायक और सांसद रातों-रात राष्ट्रहित में क्यों बदल जाते हैं? क्या विचारधारा का बाजार लग चुका है? क्या लोकतंत्र अब नीलामी घर में तब्दील हो गया है?
जिस चुनाव आयोग को संविधान ने अंपायर बनाया था, उस पर भी सवाल उठ रहे हैं। जिस मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, उसका बड़ा हिस्सा आज सत्ता का उद्घोषक दिखाई देता है। जिन जांच एजेंसियों को अपराध से लड़ना था, उन पर राजनीतिक हथियार बनने के आरोप लग रहे हैं। अगर ये आरोप गलत हैं तो जनता के मन में पैदा हुए अविश्वास को दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है?
दुनिया की कई लोकतांत्रिक संस्थाओं ने भारत की लोकतांत्रिक स्थिति को लेकर चिंता जताई है। लेकिन सत्ता हर आलोचना को विदेशी साजिश बताकर खारिज कर देती है। सवाल है—क्या हर आलोचक देशद्रोही है? क्या हर असहमति राष्ट्रविरोध है? क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अब अपराध हो गया है?
आज असली मुद्दे बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य होने चाहिए थे। लेकिन देश का राजनीतिक विमर्श इस बात पर अटक गया है कि चुनाव कौन जीतेगा और कैसे जीतेगा। जनता गैस सिलेंडर, नौकरी और अस्पताल के लिए परेशान है, जबकि सत्ता और विपक्ष सीटों के गणित में उलझे हैं।
इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र एक दिन में नहीं मरता। उसकी हत्या धीरे-धीरे होती है। पहले संस्थाएं कमजोर होती हैं, फिर विपक्ष कमजोर होता है, फिर मीडिया कमजोर होता है और अंत में जनता की आवाज़ कमजोर हो जाती है। जब तक लोगों को खतरे का एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
इसलिए सवाल किसी पार्टी का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जो जनता से कह रही है—तुम वोट डालो, बाकी हम देख लेंगे।
याद रखिए, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत चुनाव नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव है। सबसे बड़ी ताकत सरकार नहीं, बल्कि सरकार को चुनौती देने का अधिकार है। जिस दिन यह अधिकार खत्म हुआ, उस दिन संविधान किताबों में रह जाएगा और लोकतंत्र भाषणों में।
फैसला जनता को करना है।क्या वह लोकतंत्र की प्रहरी बनेगी या सिर्फ दर्शक? क्योंकि इतिहास का सबसे खतरनाक अपराध अत्याचार नहीं, बल्कि अत्याचार के सामने खामोशी होती है।


रिपोर्टर