एक गुरु की शिखर से शून्य की यात्रा - सीमा योगभारती
- सुनील कुमार, जिला ब्यूरो चीफ रोहतास
- Mar 13, 2026
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अनिल कुमार सिंह
ब्यूरो चीफ भोजपुर ।"गुरु ग्रंथन का सार है, गुरु है प्रभु का नाम,
गुरु अध्यात्म की ज्योति है, गुरु हैं चारों धाम"।
श्रेष्ठ गुरु वह होता है जो केवल ज्ञान न दे बल्कि अपने शिष्यों के जीवन चरित्र को बदल दे। गुरु शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला। गुरु हमारे जीवन की वह कड़ी है जो हमे अपने आप से मिलाता है। सही अर्थों में गुरु वह ज्ञान है जो हमे खुद का बोध कराता है। गुरु ही हमें अंधकाररूपी निराशा, हताशा, अज्ञानता से ऊपर उठाकर प्रकाशरूपी आशा और ज्ञान से मिलाता है। अतः गुरु ही हमारे जीवन का आधार होता है।
परमपूज्य धर्मसम्राट युगचेतनापुरूष परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महराज जो सिद्धाश्रम के स्वामी सच्चिदानंद के अवतार हैं, जो सप्तऋषियों के स्वामी हैं, जो माता आदिशक्ति जगतजननी जगदम्बा के पुत्र हैं, जो मायापति हैं, जिन्होंने शिखर से शुन्य की यात्रा की है अपने शिष्यों को शून्य से शिखर तक पहुंचाने के लिए तथा माता आदि शक्ति जगतजननी जगदम्बा के आदेश पर पृथ्वीलोक पर धर्म की स्थापना तथा अनीति अन्याय अधर्म और असत्य के खिलाफ आवाज उठाकर उसे नष्ट करने और अपने चेतना अंशों को पात्र बनाकर धर्मयोद्धा बनाने के लिए आए हैं। जिस तरह गुरुवर हमें अपना बनाकर हमारे सारे अवगुणों को मिटा कर हर पल - हर क्षण हमें सत्य पथ पर बढ़ा रहे है हमे अपनी उर्जा देकर हमे शक्ति साधक बना रहे, उसी तरह हमारा कर्तव्य है कि हम सभी सत्य के पथ पर चले, मां की भक्ति करे और अपने अंदर परिवर्तन लाये।
गुरुवर श्री द्वारा हर वर्ष अपने शिष्यों को शारदीय नवरात्रों के त्रिदिवसीय शिविरों में दशमी के दिन तथा सिद्धाश्रम स्थापना दिवस के दो दिवसीय शिविरों में 23 जनवरी को ही दीक्षा प्रदान किया जाता है। दीक्षा का कोई शुल्क नहीं होता सभी अमीर - गरीब चाहे वे किसी जाति से हो, एक साथ बैठ कर गुरुवर श्री से दीक्षा ग्रहण करते है। गुरुवर कहते है कि हमारा जन्म दो बार होता है - एक तब जब हम अपने स्थूल माता के द्वारा जन्म प्राप्त करते है और एक तब हम किसी चेतनावान गुरू से दीक्षा प्राप्त करते है। दीक्षा प्राप्त करने के बाद हमारा नवीन जन्म होता है और जहां से हमारी अध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ होती है और एक अध्यात्मिक शिशु का जन्म होता है।
जिस तरह स्थूल की माँ हमें नौ महिने अपनी कोख में रखकर अपने खून से हमे सिंचती है उसी प्रकार एक चेतनावान गुरु अपनी उर्जा से हमें सिंचता है। भौतिक जगत की मां से जो हमे भौतिक शरीर प्राप्त हुआ है वे हमारी बस इसी जन्म की होती है पर जो गुरु होते हैं वे हमारे साथ हर पल हर क्षण हर जन्म में होते हैं। हमारे सुख-दुख में, लाभ-हानि, जीवन मरण हर परिस्थिति में साथ निभाते है। गुरुवर श्री हमे अपनी अध्यात्मिक उर्जा से चेतना प्रदान कर पात्र बना रहे है ताकि माँ के द्वारा आदेशित उस महान कार्य के हम माध्यम बन सके जिसका गुरुवर श्री ने संकल्प लिया है। गुरुवर श्री शक्तिपुत्र जी महाराज का संकल्प है इस कलीकाल को मिटाकर धर्म की स्थापना कर सतयुग लाना और जन जन को मां की भक्ति से जोड़ना।


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