युद्व भारत की विवशता अगर पाकिस्तान लंबी युद्व खींचता है तो होगा उसका समूल नष्ट


रोहतास । भारत ने सिंदूर आपरेशन अपने आत्म रक्षार्थ एवं शहीद भारतीयों के याद एवं उनकी निर्मम हत्या के बदले चलाया है। इस संबंध में काशी काव्य संगम रोहतास जिले के जिला संयोजक कवि सह साहित्यकार सुनील कुमार रोहतास ने जिले के किशुनपुरा गांव से बताते हैं कि जैसा कि सदैव माना जाता रहा है कि युद्ध कभी भी प्रथम निर्णय नहीं, होता वह सदैव और सर्वथा अंतिम निर्णय होता है। और युद्ध तब ही होता है, जब दो पक्षों का संवाद पूरी तरह से समाप्त हो जाता है और कोई एक पक्ष कहीं ना कहीं कुछ ऐसे कार्य कर देता है या वर्षों से क्रमशः करता चला आता है। जिसे दूसरा पक्ष अपनी सामर्थ्य की सीमा तक सहन करता है। किन्तु उसके सामर्थ्य की यह सीमा कितनी होगी, यह कोई नहीं जानता । किंतु कोई भी विवेकशील पक्ष कभी भी युद्ध का निर्णय भावना में आकर नहीं लेता। युद्ध सदैव उन तथ्यों के आधार पर किए जाते हैं कि कोई एक पक्ष अपनी मनमानी पर उतर आया हो और वह किसी के समझाने पर समझ नहीं रहा हो और वह अपनी छलनीति कूटनीति के तरह-तरह के घातक प्रहारों द्वारा दूसरे पक्ष के पीछे पड़ा हुआ हो । 


                 फिर भी जो पक्ष जितना भी अधिक विवेकशील होगा, वह युद्ध को उतना ही अधिक टाले रखने का यत्न करेगा। किंतु इसका कठोर दंड भी उसे ही भुगतना पड़ता है, जो विवेकशील है!!क्योंकि यदि कोई एक पक्ष जिम्मेवार नहीं है या जिद्दी है या अहंकारी है या थेथर है, तो उसको विवेकशीलता और नैतिकता की बातें समझ ही नहीं आती और तब दूसरा पक्ष अपने सामर्थ्य की सीमा लाँघकर युद्ध जैसी अंतिम किन्तु भीषण कार्रवाई आरंभ करता है। यद्यपि हम सभी जानते हैं कि युद्ध कभी निर्णायक नहीं होते, क्योंकि वह अपने पीछे हजारों लाखों घाव छोड़ जाते हैं और सब कुछ अस्त-व्यस्त कर देते हैं और उन्हें फिर से पूर्व स्थिति तक लाना युद्ध जीतने वाले के लिए भी उतना ही संघर्ष भरा होता है और पराजित पक्ष की तो पूछिए ही मत ! उसे वापस खड़ा होने में दशकों लग जाते हैं, क्योंकि उसकी कमर पूरी तरह से टूट जाती है! 


               किंतु, पुनः जैसा कि हम जानते हैं, पागल व्यक्ति को आप कुछ भी समझाओ, उसके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता ! इस प्रकार एक अनवरत छल युुद्ध छेड़े हुए कोई भी अहंकारी राष्ट्र उसी पागल व्यक्ति की भांति होता है, जिसके पल्ले दुनिया के किसी भी व्यक्ति या देश की बात नहीं पड़ती ! रामायण का युद्ध उसके एक पक्ष राम के द्वारा धरती को राक्षसों से मुक्ति दिलाने के लिए हुआ था। वह केवल अपनी पत्नी को अपनी धरती पर वापस लाने के लिए नहीं लड़ा गया था। महाभारत का युद्ध एक पूरे पक्ष को न्याय दिलाने के लिए हुआ था। जहां दूसरा पक्ष उस पक्ष को सुई की एक नोंक के बराबर भूमि देने को भी तैयार नहीं था! दोनों युद्धों में एक बात समान थी कि दोनों युद्धों के पराजित पक्ष अपने झूठे अहंकार के कारण युद्ध टालने के सभी प्रयासों को विफल करते गए और तब युद्ध आरंभ हुए और अंत में उन्हें मुंह की खानी पड़ी और पराजितों के कुटुंब के कुटुंब और वहां की जनता का नाश हो गया! किंतु वे समस्त अहंकारी इन परिणामों और परिस्थितियों को देखने के लिए जीवित भी ना बचे, जो उन्हें यह बात पाती कि उनके अहंकार के कारण उनकी यह गति (दुर्गति) हुई !


                  भारत के समक्ष 1947 से लगातार यही स्थिति बनी चली आ रही है कि एक विफल पड़ोसी राष्ट्र अपने राष्ट्रध्यक्षों के झूठे अहंकार के चलते बार-बार अपने राष्ट्र को उन युद्धों में झोंक देते हैं, जिनसे उनके स्वयं के नाश हो जाने का खतरा है! ऐसे अहंकारी राष्ट्राध्यक्ष पूरी तरह से दायित्वहीन और गैर जिम्मेदार लोग हुआ करते हैं। चाहे वह किसी भी राष्ट्र के अध्यक्ष क्यों ना हो! किंतु ऐसे राष्ट्राध्यक्षों के कारण उस देश की करोड़ लोगों की जनसंख्या को जो परिणाम भुगतने पड़ते हैं, वो अत्यंत लोमहर्षक होते हैं, जिनके विषय में उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोच होता! किंतु तब भी वे राष्ट्राध्यक्ष और उनकी पूरी व्यवस्था पूरे संसार के समक्ष विक्टिम कार्ड खेलते हुए अपने उन नागरिकों को देशभक्ति के नाम पर ऐसे प्रपंच में डालती चली जाती है और ऐसा प्रोपगंडा को फैलाकर उस जनता के मन में भी एक ऐसा भ्रम पैदा कर देती है कि यदि वे नागरिक इस समय अपने देश के साथ नहीं है, तो वे देशद्रोही कहलाएंगे और इस प्रकार युद्ध के समय एक विफल राष्ट्र का नागरिक समाज भी उसे युद्ध के खतरनाक परिणाम की परवाह किए बिना अपने राष्ट्र के पक्ष में एकमएक होकर खड़ा हो जाता है! 


                यद्यपि उस स्थिति से पूर्व और युद्ध के परिणाम के पश्चात वह नागरिक समाज अपने इस विफल राष्ट्र के समस्त कर्णधारों और उनकी नीतियों को लगातार कोसते दिखाई पड़ते हैं, जिन पर उनका कोई वश नहीं चलता! किंतु दुर्भाग्यवश (या नियतिवश!) ऐसे राष्ट्राध्यक्षों के ऊपर किसी भी दूसरे देश के कि किसी भी सलाह का प्रभाव भी तो नहीं पड़ता! ऐसे में बहुतों बार तो विभिन्न तरह की कूटनीतियों के सहारे ऐसे राष्ट्र-अध्यक्षों को चलता भी किया जाता है! किंतु यह भी सदैव संभव नहीं होता ! भारत ने अपनी आत्मरक्षा के लिए यह जो निर्णायक कदम उठाया । उसके विरुद्ध पाकिस्तान ने भारत के नागरिक क्षेत्र पर हमला करने का जो दुष्प्रयास किया और उसके इन प्रयासों को भी भारतीय सेना के एयर डिफेंस सिस्टम ने पूरी तरह से विफल कर दिया। ऐसे में उसे शीघ्र ही यह समझ जाना चाहिए कि इस युद्ध को लंबा खींचना उसे अपने आप को पूरी तरह से तहस-नहस कर लेना होगा! 


               किंतु सच तो यह है कि अब वह असफल राष्ट्र इस युद्ध को लंबा खिंचवाए बगैर रह भी नहीं सकता! क्योंकि जितना लंबा वह इस युद्ध को खींच पाएगा! उतना ही ज्यादा विक्टिम कार्ड खेल पाएगा! तो समझने की चेष्टा कीजिए कि उस राष्ट्र के समस्त लोगों का यह भी कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि ऐसे असफल और अहंकारी राष्ट्राध्यक्षों के चलते वह उनमें से कितने ही लोग अकारण ही मारे जाने वाले हैं! किन्तु वे राष्ट्राध्यक्ष अभी भी यह नहीं समझ रहे कि उसके द्वारा यह विक्टिम कार्ड खेला जाना भी पूरी तरह से विफल साबित हो चुका है! क्योंकि दुनिया के वे देश भी उसके साथ नहीं खड़े हैं, जिनको वह अपने धर्म के नाम पर अपने साथ खड़ा होने के स्वप्न वाले बैठा हुआ था! उसके इक्का-दुक्का मित्र राष्ट्र उसके मित्र होने का ढोंग जरूर कर रहे हैं! लेकिन उन मित्र राष्ट्रों को भी यह नहीं पता है कि वो पाकिस्तान को किस कुएं में धकेल रहे हैं और उसकी करोड़ों की जनसंख्या को भूखे मरने के इंतजाम कर रहे हैं! 


             अब यह अनिवार्य है कि उन सो कॉल्ड मित्र राष्ट्रों को इस विफल राष्ट्र को अविलंब युद्ध रोकने के लिए जिम्मेवार प्रयासों को करने के लिए कहना चाहिए। ताकि भारतीय उपमहाद्वीप की बहुत बड़ी जनसंख्या नष्ट होने से बच सके। तहस-नहस होने से बच सके। उस विफल राष्ट्र की बची-खुची अर्थव्यवस्था चाहे, कितनी ही कठिनाइयों से क्यों ना हो, किंतु वापस पटरी पर आ सके। मानव धर्म, मनुष्यता का धर्म हमें सदैव यही सिखलाता है कि पागलों के साथ पंगा ना लो! लेकिन पागल छुट्टे भी तो नहीं घूम सकते ना! इसलिए उन्हें पागलखाने में बंद करने का विकल्प ही सही होता है और देश के संदर्भ में यह निर्णय युद्ध के रूप में किया जाना! 


            युद्ध छेड़ना किसी भी जिम्मेवार देश की सबसे बड़ी विवशता होती है! और इस विवश स्थिति में भारत ने एक निर्णायक युद्ध छेड़ा है। जिसे यदि वह विफल राष्ट्र लंबा खींचने की तनिक भी चेष्टा करता है, तो यह तो तय है कि वह तो पूरी तरह नष्ट हो ही जाएगा। लेकिन इसके पश्चात इसकी आने वाली पीढ़ियां उसे जीवन भर कोसेंगी ! हमें आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण विश्वास है कि यह बात इन विफल अहंकारी राष्ट्रध्यक्षों को नहीं समझ आएगी! भारत ने बालूचिस्ततान को अलग राष्ट्र की मान्यता देते हुए अपने देश में राजदूत कार्यालय खोलना एवं यूएन में नये राष्ट्र का प्रस्ताव रखना। पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने का प्रयास है।जिस तरह से रावण ने सीता हरण कर अपना समूल नष्ट कर लिया।उसी तरह पाकिस्तान ने नवविवाहित की अधिकारी पति सहित सभी को मौत की घाट धर्म पूछकर उतारा, इससे स्पष्ट प्रतित होता है कि पाकिस्तान का समूल नष्ट होने से कोई नहीं रोक पायेगा।

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