सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज का परिचय
- सुनील कुमार, जिला ब्यूरो चीफ रोहतास
- Jul 28, 2026
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अनिल कुमार सिह
ब्यूरो चीफ भोजपुर।परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के बचपन का नाम श्री रामबरन शुक्ल है। आप छह भाइयों में सबसे छोटे हैं व उनके बीच दो बहनें भी हैं। आपके जन्म से ही परिवार में आध्यात्मिक वातावरण दिन-प्रतिदिन जाग्रत् होता चला गया । बचपन से ही आप अधिकांशतः माता भगवती दुर्गा जी की साधना-उपासना में रत रहते थे। आपके बचपन की सैकड़ों छोटी-छोटी आध्यात्मिक घटनाएं आपके परिवार व अन्य लोगों को आपके अवतारी पुरुष होने का अनुभव कराती थीं। अनेकों दिव्य महापुरुषों एवं साधु-संतों ने बचपन में ही योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज को देखकर उनके प्रभावक योगों तथा भविष्य में आपके द्वारा संन्यस्त जीवन व्यतीत करके विश्वअध्यात्मजगत् को आध्यात्मिक चिन्तन देने के योगों के विषय में बतलाया था ।*कुछ संतों ने तो आपके माता-पिता से आपको मांगकर अपने साथ संन्यस्त जीवन में रखने का भी आग्रह किया था, किन्तु माता-पिता ने स्नेहवश उनके आग्रह को किसी भी प्रकार से स्वीकार नहीं किया । आपने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा निज ग्राम भद्रवास (भदबा) में ही पूर्ण की ।*अपनी कक्षा में आप सबसे मेधावी छात्र थे ।_
_उस समय, गाँव के चारों तरफ अनेकों धार्मिक स्थल, कुटियायें व वाटिकायें बनी हुई थीं, जहाँ पर साधु-सन्त-महात्मा बाहर से आकर सत्संग किया करते थे। विद्यालय में अंतिम घण्टा खेल का हुआ करता था, किन्तु उसे छोड़कर आप सत्संग में चले जाते और बड़े चाव से उन महात्माओं के वचनों का रसपान करते थे। विद्याध्ययन के साथ-साथ आप अधिकतर अपनी साधनाओं में रत रहते थे। युवावस्था आते-आते परम पूज्य गुरुदेव जी महाराज अपने भाइयों में सबसे छोटे होने के बावजूद अपनी महत्त्वपूर्ण साधनात्मक स्थिति स्थापित कर चुके थे। परिवार के लोग भी उनके चिन्तनों एवं विचारों को महत्त्व देने लगे थे ।_
_एक निर्धारित शिक्षा प्राप्त करने के बाद परिवार के आग्रह के बावजूद परम पूज्य गुरुदेव जी महाराज ने आगे की शिक्षा प्राप्त करने से स्पष्ट इनकार कर दिया और उन्हें अवगत कराया था , *‘‘अब आगे की शिक्षा की आवश्यकता मुझे नहीं है। यह शिक्षा मेरे उपयोग की नहीं होगी। अब मैं अपने कर्म से उपार्जित धन के माध्यम से अपना जीविकोपार्जन करूंगा और पूर्ण आध्यात्मिक जीवन जीते हुये माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी की साधना-उपासना में अपने आपको रत रखना चाहता हूँ। यही मेरे जीवन का लक्ष्य है। समाज में सामान्य आवश्यकता की पूर्ति हेतु मैं सामाजिक शिक्षा प्राप्त कर चुका हूँ। अब माता भगवती की प्राप्ति ही मेरे जीवन का लक्ष्य है तथा उनको प्राप्त करके उनके द्वारा प्रदत्त शिक्षा, ज्ञान एवं चिन्तन ही मेरी आगे की शिक्षा होगी । ’’


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