कल्याण में हिंदी नवलेखकों का सृजन पर्व संपन्न
- Rohit R. Shukla, Journalist
- Mar 01, 2026
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छह दिवसीय शिविर में नौ राज्यों के 70 प्रतिभागियों ने लिया भाग
कल्याण। बी. के. बिड़ला महाविद्यालय में आयोजित छह दिवसीय हिंदीतर भाषी हिंदी नवलेखक शिविर का रविवार को गरिमामय वातावरण में सफलतापूर्वक समापन हुआ। यह शिविर महाविद्यालय एवं केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया था। शिविर का उद्देश्य हिंदीतर भाषी युवाओं में सृजनात्मक लेखन की क्षमता विकसित करना, उन्हें साहित्य की विभिन्न विधाओं से परिचित कराना तथा राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक संवाद को सुदृढ़ करना रहा।
समापन समारोह में महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के डीन प्रो. अवधेश शुक्ल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अपने उद्बोधन में उन्होंने मध्यकालीन हिंदी कवियों की रचना प्रक्रिया, उनके सामाजिक सरोकारों और आध्यात्मिक दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए नवलेखकों को उस कालखंड के साहित्य से प्रेरणा ग्रहण करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि संत एवं भक्तिकालीन कवियों ने सीमित संसाधनों में भी जनमानस की भावनाओं को अभिव्यक्त किया और साहित्य को समाज परिवर्तन का माध्यम बनाया। नवलेखकों को चाहिए कि वे परंपरा और आधुनिकता के समन्वय से सशक्त लेखन की दिशा में आगे बढ़ें।
विशिष्ट अतिथि के रूप में मुंबई विश्वविद्यालय के डीएलएलएलई विभाग के निदेशक डॉ. बलिराम गायकवाड़ ने युवाओं को लेखन के नए आयामों, शोधपरक दृष्टिकोण और सामाजिक उत्तरदायित्व से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि विविधताओं से भरे भारत को जोड़ने वाली सांस्कृतिक सेतु है। ऐसे शिविर राष्ट्रीय एकता और भावनात्मक समरसता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
महाविद्यालय के शिक्षा निदेशक डॉ. नरेश चन्द्र ने साहित्य को समाज का दर्पण और मार्गदर्शक बताते हुए कहा कि लेखक की जिम्मेदारी केवल रचना करना नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना को दिशा देना भी है। प्राचार्य डॉ. अविनाश पाटील ने केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि महाविद्यालय प्रबंधन समिति भविष्य में भी ऐसे शैक्षणिक एवं साहित्यिक आयोजनों के लिए सदैव प्रतिबद्ध रहेगी।
निदेशालय के सहायक निदेशक शरत्नेश कुमार मिश्र ने अपने संबोधन में निदेशालय की विभिन्न गतिविधियों, प्रकाशनों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जानकारी दी। उन्होंने नवलेखकों को श्रेष्ठ लेखक बनने से पहले श्रेष्ठ पाठक बनने की सलाह देते हुए कहा कि व्यापक अध्ययन से ही लेखन में गहराई और मौलिकता आती है।
कार्यक्रम के दौरान ‘समीचीन’ के संपादक डॉ. सतीश पाण्डेय ने कथेतर गद्य विधाओं—जैसे निबंध, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत और आलोचना—की रचना प्रक्रिया पर विस्तृत चर्चा की। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय से पधारे प्रो. राजेंद्र गौतम ने कविता की संरचना, बिंब, प्रतीक और लय के विविध आयामों से प्रतिभागियों को परिचित कराया। उन्होंने प्रयोगधर्मिता और संवेदनशीलता को कविता की आत्मा बताया।
सप्ताहभर चले इस शिविर में असम, पुदुचेरी, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, अरुणाचल प्रदेश और महाराष्ट्र सहित नौ राज्यों के 70 नवलेखकों ने सक्रिय सहभागिता की। विभिन्न सत्रों में डॉ. दामोदर खडसे, डॉ. मधु कांकरिया, डॉ. हूबनाथ पाण्डेय, डॉ. सत्यदेव त्रिपाठी, डॉ. नेहा कल्याणी, डॉ. सचिन गपाट तथा वरिष्ठ पत्रकार नवीन पाण्डेय सहित अनेक विद्वानों ने साहित्य सृजन की बारीकियों, भाषा की शुद्धता, विषय चयन, अभिव्यक्ति की स्पष्टता और साहित्यकारों की सामाजिक जिम्मेदारियों पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया।
शिविर के समन्वयक प्रो. श्यामसुंदर पाण्डेय ने सभी अतिथियों, विद्वानों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस आयोजन ने विभिन्न भाषायी पृष्ठभूमि से आए युवाओं को हिंदी लेखन की मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य किया है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि प्रतिभागी यहां से प्राप्त ज्ञान और अनुभव को अपने-अपने राज्यों में ले जाकर हिंदी साहित्य के संवर्धन में योगदान देंगे।
यह आयोजन उपप्राचार्य डॉ. हरीश दुबे, डॉ. महादेव यादव, डॉ. बालकवि सुरंजे, डॉ. प्रतिभा गाढे, डॉ. सीताराम म्हस्के, प्रा. विशाखा, प्रा. तन्मयी एवं हिन्दी विभाग के विद्यार्थियों के सहयोग से सुव्यवस्थित रूप से संपन्न हुआ। समापन अवसर पर प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए और भविष्य में भी ऐसे रचनात्मक शिविर आयोजित करने का संकल्प लिया गया।


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