मनरेगा को कृषि क्षेत्र से जोड़ने की सरकार द्वारा विचार करने की है जरूरत

संवाददाता श्याम सुंदर पाण्डेय की रिपोर्ट 

दुर्गावती(कैमूर)-- मनरेगा को सीधे किसानों से जोड़ देना चाहिए क्योंकि किसानो को ही मजदूरो की सबसे अधिक जरूरत है।मजदूर समय बध तरीके से और पैमाने के अनुसार किसानों के खेतों मे काम करें और अपना भुगतान लेकर घर चला जाए। आज मनरेगा एक नेताओं और सरकारी पदाधिकारीयो के लूट का साधन बनकर रह गया है। जितने भी मिट्टी के काम है ठेकेदार बड़ी-बड़ी मशीनों से करा लेते हैं। अक्सर ग्राम पंचायतो में मिट्टी के काम के लिए मजदूरों का चयन लोग करते हैं लेकिन सारी मिट्टी बह गई का बहाना लगाकर सारे मिट्टी के पैसे निकाल लिए जाते हैं। यही नहीं ग्राम पंचायत के पोखरे आहर तालाब को अक्सर उसका घास छिलकर बिल का भुगतान करा लिया जाता है इसके भुगतान में यदि निष्पक्ष जांच कराया जाए तो अधिकारी से लेकर प्रतिनिधि तक की संलिप्तता में शामिल है कहना अनुचित नहीं होगा। कृषि क्षेत्र में हर समय मजदूरों की जरूरत है और इन मजदूरों को सरकार को चाहिए कि कृषि क्षेत्र में किसानों से जोड़   दें और किसानो का काम करने के बाद जो मजदूरी बनती है उसका भुगतान सरकार कर दे ताकि किसने की भी मदद हो जाए और मजदूरों का भी। लेकिन सरकार ऐसा नहीं कर सकती क्योंकि राजनीति को जिंदा करने के लिए मजदूरों को कृषि से बाहर रखना परम आवश्यक है। सामान्य रूप से नजरे दौड़ा कर देखा जाए तो मनरेगा की कोई ऐसी योजना नहीं है जो धरातल पर सफल है न कहीं दिखाई दे रही है लेकिन निकासी लाखों और करोड़ों की हो चुकी है। क्या सरकार के द्वारा नए मनरेगा के नाम कानून और प्रारूप बनाए जाने के बाद अब देखना यह है कि क्या सरकार इसमें पारदर्शिता ला सकती है या यूं ही नाम बदलकर योजना पुराने तरीके से चलती रहेगी। इसके लिए ठेकेदारी प्रथा को  सख्त और पारदर्शी बनाने के लिए सबसे पहले इंजीनियरों पर नकेल कसने की जरूरत है क्योंकि योजना पर सही ढंग से और मानक के अनुसार काम हुआ है उसका प्रमाण पत्र तो इंजीनियर ही देता है फिर योजना कैसे क्षतिग्रस्त हो जाती है। सच पूछा जाए तो बिना नकेल लगाए योजना में पारदर्शिता कभी आ ही नहीं सकती हैं।

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