भिवंडी में चौथे स्तंभ की बदलती तस्वीर, पत्रकारिता से वकालत और यूट्यूबर का सफर

भिवंडी। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता की भूमिका भिवंडी शहर में तेजी से बदलती नजर आ रही है। कभी जनसमस्याओं, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक सरोकारों की आवाज मानी जाने वाली स्थानीय पत्रकारिता आज गंभीर संक्रमण के दौर से गुजर रही है। शहर के बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि पत्रकारिता का मूल स्वरूप कमजोर पड़ता जा रहा है और उसकी जगह अव्यवस्था, व्यक्तिगत स्वार्थ और डिजिटल दिखावे ने ले ली है।

स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि भिवंडी में पत्रकारिता अब चंद जिम्मेदार लोगों के बजाय ऐसे तत्वों के हाथों में चली गई है, जिनका उद्देश्य सूचना देना कम और व्यक्तिगत प्रभाव बढ़ाना अधिक है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ तथाकथित पत्रकार ब्लैकमेलिंग, दबाव बनाने और सौदेबाजी जैसी गतिविधियों से जुड़े रहे हैं, जिससे पत्रकारिता की साख को नुकसान पहुंचा है।

इसी बीच भिवंडी में एक और बड़ा बदलाव देखने को मिला है। जो पत्रकार कभी खबरों के जरिए व्यवस्था से सवाल करते थे, उनमें से कई अब कोर्ट की राह पकड़ चुके हैं और वकील के रूप में सक्रिय हो गए हैं। वकालत में कदम रखने वाले पूर्व पत्रकारों में शरद भसाले, नितीन पंडित, रामदास पाटिल, अब्दुल बाकी अंसारी, चांदनी बी. मुजावर, योगेश जाधव और नरेंद्र गुप्ता जैसे नाम शामिल बताए जाते हैं। जानकारों का मानना है कि अनुभव और संपर्कों के कारण पत्रकारों का वकालत में जाना स्वाभाविक है, लेकिन इससे स्थानीय पत्रकारिता का खालीपन और अधिक गहरा हुआ है।

दूसरी ओर, डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव ने भिवंडी की मीडिया संरचना को पूरी तरह बदल दिया है। बताया जा रहा है कि शहर में करीब 150 से अधिक यूट्यूबर और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर सक्रिय हैं, जिन्होंने खुद को पत्रकार के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है। इनमें से अधिकांश लोग वीडियो बनाकर इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सएप पर रील्स के माध्यम से खबरें परोस रहे हैं। हालांकि, वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि इन तथाकथित डिजिटल पत्रकारों में से कई को न तो समाचार लेखन का प्रशिक्षण है और न ही तथ्य जांच की समझ। सिर्फ कैमरे के सामने बोल देना और सनसनीखेज शीर्षक लगाना पत्रकारिता नहीं कहलाता। पढ़ने-लिखने की बुनियादी योग्यता और मीडिया आचार संहिता की समझ के अभाव में गलत सूचना फैलने का खतरा बढ़ गया है।

भिवंडी के सामाजिक हलकों में यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि जब पत्रकारिता जिम्मेदारी से हटकर लोकप्रियता और व्यूज की दौड़ में शामिल हो जाए, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका कौन निभाएगा। जानकारों का मानना है कि आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता से जुड़े संगठनों, प्रशासन और समाज को मिलकर वास्तविक और जिम्मेदार पत्रकारों को प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि खबर और अफवाह के बीच की लकीर साफ बनी रहे।

रिपोर्टर

संबंधित पोस्ट