करवा चौथ: केवल व्रत से नहीं, विश्वास से टिकते हैं रिश्ते
- संदीप मिश्र, ब्यूरो चीफ जौनपुर
- Oct 29, 2026
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12वीं फेल’ से वैवाहिक विवादों तक रिश्तों की बदलती तस्वीर; आस्था के साथ बराबरी, सम्मान और सुरक्षा भी जरूरी करवा चौथ: केवल व्रत से नहीं, विश्वास से टिकते हैं रिश्ते
‘12वीं फेल’ से वैवाहिक विवादों तक रिश्तों की बदलती तस्वीर; आस्था के साथ बराबरी, सम्मान और सुरक्षा भी जरूरी
रामनरेश प्रजापति पत्रकार, गोल्ड मेडलिस्ट- जनसंचार एवं पत्रकारिता पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर
करवा चौथ भारतीय समाज में दांपत्य प्रेम, आस्था और विश्वास का प्रतीक है। इस दिन विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी जीवन की कामना के साथ व्रत रखती हैं। चांद के दीदार के साथ व्रत खोलने की परंपरा भावनाओं और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है। लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या रिश्तों की मजबूती केवल एक दिन के व्रत से तय होती है? दरअसल, दांपत्य जीवन की असली ताकत रोजमर्रा के व्यवहार, आपसी सम्मान, भरोसे और जिम्मेदारियों को साझा करने में है। आस्था रिश्तों को भावनात्मक आधार देती है, लेकिन उन्हें मजबूत बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों का समान योगदान जरूरी है।
भारतीय परंपरा में व्रत और त्योहारों का अपना सांस्कृतिक महत्व है। किसी के लिए करवा चौथ प्रेम की अभिव्यक्ति है, तो किसी के लिए यह पारिवारिक परंपरा। दोनों ही स्थितियों में व्यक्तिगत आस्था और स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए। प्रेम का अर्थ यह नहीं कि एक व्यक्ति त्याग करता रहे और दूसरा केवल अपेक्षाएं रखे। मजबूत रिश्ता वही है, जिसमें दोनों एक-दूसरे की भावनाओं, इच्छाओं और कठिनाइयों को समझें।
आज के बदलते सामाजिक परिवेश में परिवार की जिम्मेदारियां भी नए रूप ले रही हैं। बच्चों की परवरिश, घर का काम, बुजुर्गों की देखभाल और आर्थिक जरूरतें केवल किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं हैं। पति-पत्नी जब इन दायित्वों को मिलकर निभाते हैं, तभी रिश्ते में बराबरी और साझेदारी का भाव मजबूत होता है। एक-दूसरे के सपनों और करियर को जगह देना भी प्रेम का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारतीय परंपरा में राधा-कृष्ण, सीता-राम और सावित्री-सत्यवान के प्रसंग प्रेम, निष्ठा और समर्पण की अलग-अलग छवियां प्रस्तुत करते हैं। आज के संदर्भ में इनसे मिलने वाली प्रेरणा यह है कि प्रेम के साथ संवेदनशीलता, कर्तव्य के साथ न्याय और समर्पण के साथ व्यक्ति की गरिमा भी बनी रहनी चाहिए। रिश्ते की सफलता किसी एक के त्याग से नहीं, बल्कि दोनों की जिम्मेदारी और संवेदनशीलता से तय होती है।
फिल्म ‘12वीं फेल’ में मनोज और श्रद्धा की कहानी संघर्ष के बीच एक-दूसरे का साथ देने की अहमियत सामने रखती है। जीवन में सफलता का रास्ता हमेशा आसान नहीं होता। आर्थिक तंगी, असफलता, सामाजिक दबाव और भविष्य की अनिश्चितता के बीच जीवनसाथी का भरोसा व्यक्ति को संबल देता है। ऐसे समय में ताने या तुलना करने के बजाय सहयोग और हौसला रिश्ते को मजबूत बनाते हैं।
हालांकि, किसी फिल्म की कहानी वास्तविक जीवन की सभी परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व नहीं करती, लेकिन उससे यह सीख जरूर मिलती है कि दांपत्य संबंध केवल उत्सव और खुशियों तक सीमित नहीं होते। मुश्किल समय में एक-दूसरे के साथ खड़े रहना, निर्णयों में भागीदारी देना और सम्मान बनाए रखना ही रिश्ते की वास्तविक परीक्षा है।
इसी संदर्भ में डॉ. विकास दिव्यकीर्ति का उल्लेख संक्षेप में प्रासंगिक है। शिक्षा और सार्वजनिक विमर्श के क्षेत्र में उन्होंने संविधान, प्रशासन, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों को सरल भाषा में युवाओं तक पहुंचाया है। उनके प्रयासों से संवैधानिक चेतना, विवेकपूर्ण सोच और मानवीय संवेदनशीलता पर चर्चा को बल मिला है। रिश्तों, कानून और सामाजिक न्याय से जुड़े प्रश्नों पर भी ऐसी संतुलित दृष्टि जरूरी है, ताकि भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बजाय तथ्य, अधिकार और जिम्मेदारी के आधार पर निष्कर्ष निकाले जाएं। हालांकि, किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व के विचारों का मूल्यांकन स्वतंत्र विवेक और संवैधानिक कसौटियों पर ही किया जाना चाहिए।
हाल के वर्षों में वैवाहिक विवादों और उनसे जुड़ी घटनाओं ने समाज में कई सवाल खड़े किए हैं। ज्योति मौर्य और आलोक मौर्य से जुड़ा सार्वजनिक विवाद हो या मेरठ के सौरभ राजपूत से जुड़े नीले ड्रम हत्याकांड जैसी गंभीर घटना, इन मामलों पर चर्चा करते समय तथ्यों और न्यायिक प्रक्रिया को प्राथमिकता देना जरूरी है।
किसी एक घटना के आधार पर सभी महिलाओं या पुरुषों के बारे में धारणा बना लेना न तो न्यायसंगत है और न ही सामाजिक रूप से उचित। अतुल सुभाष की मौत के बाद भी वैवाहिक विवादों, कानूनी प्रक्रियाओं और पुरुषों के मानसिक तनाव को लेकर व्यापक बहस हुई। ऐसे मामलों में किसी भी पक्ष के आरोपों को बिना जांच अंतिम सत्य मानना उचित नहीं है। साथ ही, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना की शिकायतों को भी केवल पारिवारिक मामला बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हर शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
न्याय की व्यवस्था का उद्देश्य पीड़ित को सुरक्षा और न्याय देना है, साथ ही किसी निर्दोष को गलत आरोपों के कारण नुकसान से बचाना भी है। इसलिए आरोप, जांच और अदालत के निष्कर्ष के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। सोशल मीडिया पर चलने वाली अधूरी सूचनाओं और एकतरफा दावों के आधार पर किसी के चरित्र या पूरे समाज पर फैसला सुनाना समस्या को और गंभीर बना सकता है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की क्राइम इन इंडिया 2023 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4,48,211 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2022 में यह संख्या 4,45,256 थी। वर्ष 2023 में पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के 1,33,676 मामले दर्ज हुए। ये आंकड़े बताते हैं कि वैवाहिक संबंधों के भीतर होने वाली प्रताड़ना एक गंभीर सामाजिक चिंता है।
हालांकि, दर्ज मामलों की संख्या को अदालत में सिद्ध अपराधों की संख्या के बराबर नहीं माना जा सकता। आंकड़ों को उनके सही संदर्भ में समझना चाहिए। फिर भी वे इस जरूरत की ओर ध्यान दिलाते हैं कि परिवार के भीतर हिंसा या प्रताड़ना की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए और पीड़ितों को समय पर सहायता मिले।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 15 भेदभाव के निषेध और अनुच्छेद 21 जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की बात करता है। इन मूल्यों का महत्व केवल सार्वजनिक जीवन तक सीमित नहीं है। परिवार और दांपत्य संबंधों में भी प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा, सुरक्षा और स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए।
सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि घरेलू हिंसा तथा उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हो, पीड़ितों को आवश्यक संरक्षण और कानूनी सहायता मिले तथा जांच निष्पक्ष रहे। समाज की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। परिवारों को ऐसे वातावरण के निर्माण की जरूरत है, जहां पति-पत्नी अपनी बात कह सकें, असहमति के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करें और विवाद होने पर संवाद या उचित कानूनी सहायता का रास्ता चुनें।
रामराज्य और विश्वगुरु भारत की कल्पना केवल सांस्कृतिक गौरव से नहीं, बल्कि न्याय, समानता, सुरक्षा और मानवीय गरिमा जैसे मूल्यों से भी सार्थक होती है। परिवार समाज की बुनियादी इकाई है। यदि वहां विश्वास, सम्मान और जिम्मेदारी का भाव मजबूत होगा, तभी व्यापक सामाजिक जीवन भी अधिक संवेदनशील और न्यायपूर्ण बन सकेगा।
करवा चौथ पर चांद का दीदार परंपरा का सुंदर क्षण है, लेकिन रिश्तों की असली परीक्षा रोजमर्रा के व्यवहार में होती है। कठिन समय में साथ देना, जिम्मेदारियां साझा करना और एक-दूसरे की गरिमा बनाए रखना ही दांपत्य जीवन को मजबूत बनाता है। व्रत एक दिन का हो सकता है, लेकिन विश्वास हर दिन निभाना पड़ता है। यही करवा चौथ का व्यापक संदेश और रिश्तों की असली ताकत है।
रामनरेश प्रजापति पत्रकार, गोल्ड मेडलिस्ट- जनसंचार एवं पत्रकारिता पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर
करवा चौथ भारतीय समाज में दांपत्य प्रेम, आस्था और विश्वास का प्रतीक है। इस दिन विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी जीवन की कामना के साथ व्रत रखती हैं। चांद के दीदार के साथ व्रत खोलने की परंपरा भावनाओं और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है। लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या रिश्तों की मजबूती केवल एक दिन के व्रत से तय होती है? दरअसल, दांपत्य जीवन की असली ताकत रोजमर्रा के व्यवहार, आपसी सम्मान, भरोसे और जिम्मेदारियों को साझा करने में है। आस्था रिश्तों को भावनात्मक आधार देती है, लेकिन उन्हें मजबूत बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों का समान योगदान जरूरी है।
भारतीय परंपरा में व्रत और त्योहारों का अपना सांस्कृतिक महत्व है। किसी के लिए करवा चौथ प्रेम की अभिव्यक्ति है, तो किसी के लिए यह पारिवारिक परंपरा। दोनों ही स्थितियों में व्यक्तिगत आस्था और स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए। प्रेम का अर्थ यह नहीं कि एक व्यक्ति त्याग करता रहे और दूसरा केवल अपेक्षाएं रखे। मजबूत रिश्ता वही है, जिसमें दोनों एक-दूसरे की भावनाओं, इच्छाओं और कठिनाइयों को समझें।
आज के बदलते सामाजिक परिवेश में परिवार की जिम्मेदारियां भी नए रूप ले रही हैं। बच्चों की परवरिश, घर का काम, बुजुर्गों की देखभाल और आर्थिक जरूरतें केवल किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं हैं। पति-पत्नी जब इन दायित्वों को मिलकर निभाते हैं, तभी रिश्ते में बराबरी और साझेदारी का भाव मजबूत होता है। एक-दूसरे के सपनों और करियर को जगह देना भी प्रेम का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारतीय परंपरा में राधा-कृष्ण, सीता-राम और सावित्री-सत्यवान के प्रसंग प्रेम, निष्ठा और समर्पण की अलग-अलग छवियां प्रस्तुत करते हैं। आज के संदर्भ में इनसे मिलने वाली प्रेरणा यह है कि प्रेम के साथ संवेदनशीलता, कर्तव्य के साथ न्याय और समर्पण के साथ व्यक्ति की गरिमा भी बनी रहनी चाहिए। रिश्ते की सफलता किसी एक के त्याग से नहीं, बल्कि दोनों की जिम्मेदारी और संवेदनशीलता से तय होती है।
फिल्म ‘12वीं फेल’ में मनोज और श्रद्धा की कहानी संघर्ष के बीच एक-दूसरे का साथ देने की अहमियत सामने रखती है। जीवन में सफलता का रास्ता हमेशा आसान नहीं होता। आर्थिक तंगी, असफलता, सामाजिक दबाव और भविष्य की अनिश्चितता के बीच जीवनसाथी का भरोसा व्यक्ति को संबल देता है। ऐसे समय में ताने या तुलना करने के बजाय सहयोग और हौसला रिश्ते को मजबूत बनाते हैं।
हालांकि, किसी फिल्म की कहानी वास्तविक जीवन की सभी परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व नहीं करती, लेकिन उससे यह सीख जरूर मिलती है कि दांपत्य संबंध केवल उत्सव और खुशियों तक सीमित नहीं होते। मुश्किल समय में एक-दूसरे के साथ खड़े रहना, निर्णयों में भागीदारी देना और सम्मान बनाए रखना ही रिश्ते की वास्तविक परीक्षा है।
इसी संदर्भ में डॉ. विकास दिव्यकीर्ति का उल्लेख संक्षेप में प्रासंगिक है। शिक्षा और सार्वजनिक विमर्श के क्षेत्र में उन्होंने संविधान, प्रशासन, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों को सरल भाषा में युवाओं तक पहुंचाया है। उनके प्रयासों से संवैधानिक चेतना, विवेकपूर्ण सोच और मानवीय संवेदनशीलता पर चर्चा को बल मिला है। रिश्तों, कानून और सामाजिक न्याय से जुड़े प्रश्नों पर भी ऐसी संतुलित दृष्टि जरूरी है, ताकि भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बजाय तथ्य, अधिकार और जिम्मेदारी के आधार पर निष्कर्ष निकाले जाएं। हालांकि, किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व के विचारों का मूल्यांकन स्वतंत्र विवेक और संवैधानिक कसौटियों पर ही किया जाना चाहिए।
हाल के वर्षों में वैवाहिक विवादों और उनसे जुड़ी घटनाओं ने समाज में कई सवाल खड़े किए हैं। ज्योति मौर्य और आलोक मौर्य से जुड़ा सार्वजनिक विवाद हो या मेरठ के सौरभ राजपूत से जुड़े नीले ड्रम हत्याकांड जैसी गंभीर घटना, इन मामलों पर चर्चा करते समय तथ्यों और न्यायिक प्रक्रिया को प्राथमिकता देना जरूरी है।
किसी एक घटना के आधार पर सभी महिलाओं या पुरुषों के बारे में धारणा बना लेना न तो न्यायसंगत है और न ही सामाजिक रूप से उचित। अतुल सुभाष की मौत के बाद भी वैवाहिक विवादों, कानूनी प्रक्रियाओं और पुरुषों के मानसिक तनाव को लेकर व्यापक बहस हुई। ऐसे मामलों में किसी भी पक्ष के आरोपों को बिना जांच अंतिम सत्य मानना उचित नहीं है। साथ ही, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना की शिकायतों को भी केवल पारिवारिक मामला बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हर शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
न्याय की व्यवस्था का उद्देश्य पीड़ित को सुरक्षा और न्याय देना है, साथ ही किसी निर्दोष को गलत आरोपों के कारण नुकसान से बचाना भी है। इसलिए आरोप, जांच और अदालत के निष्कर्ष के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। सोशल मीडिया पर चलने वाली अधूरी सूचनाओं और एकतरफा दावों के आधार पर किसी के चरित्र या पूरे समाज पर फैसला सुनाना समस्या को और गंभीर बना सकता है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की क्राइम इन इंडिया 2023 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4,48,211 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2022 में यह संख्या 4,45,256 थी। वर्ष 2023 में पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के 1,33,676 मामले दर्ज हुए। ये आंकड़े बताते हैं कि वैवाहिक संबंधों के भीतर होने वाली प्रताड़ना एक गंभीर सामाजिक चिंता है।
हालांकि, दर्ज मामलों की संख्या को अदालत में सिद्ध अपराधों की संख्या के बराबर नहीं माना जा सकता। आंकड़ों को उनके सही संदर्भ में समझना चाहिए। फिर भी वे इस जरूरत की ओर ध्यान दिलाते हैं कि परिवार के भीतर हिंसा या प्रताड़ना की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए और पीड़ितों को समय पर सहायता मिले।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 15 भेदभाव के निषेध और अनुच्छेद 21 जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की बात करता है। इन मूल्यों का महत्व केवल सार्वजनिक जीवन तक सीमित नहीं है। परिवार और दांपत्य संबंधों में भी प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा, सुरक्षा और स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए।
सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि घरेलू हिंसा तथा उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हो, पीड़ितों को आवश्यक संरक्षण और कानूनी सहायता मिले तथा जांच निष्पक्ष रहे। समाज की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। परिवारों को ऐसे वातावरण के निर्माण की जरूरत है, जहां पति-पत्नी अपनी बात कह सकें, असहमति के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करें और विवाद होने पर संवाद या उचित कानूनी सहायता का रास्ता चुनें।
रामराज्य और विश्वगुरु भारत की कल्पना केवल सांस्कृतिक गौरव से नहीं, बल्कि न्याय, समानता, सुरक्षा और मानवीय गरिमा जैसे मूल्यों से भी सार्थक होती है। परिवार समाज की बुनियादी इकाई है। यदि वहां विश्वास, सम्मान और जिम्मेदारी का भाव मजबूत होगा, तभी व्यापक सामाजिक जीवन भी अधिक संवेदनशील और न्यायपूर्ण बन सकेगा।
करवा चौथ पर चांद का दीदार परंपरा का सुंदर क्षण है, लेकिन रिश्तों की असली परीक्षा रोजमर्रा के व्यवहार में होती है। कठिन समय में साथ देना, जिम्मेदारियां साझा करना और एक-दूसरे की गरिमा बनाए रखना ही दांपत्य जीवन को मजबूत बनाता है। व्रत एक दिन का हो सकता है, लेकिन विश्वास हर दिन निभाना पड़ता है। यही करवा चौथ का व्यापक संदेश और रिश्तों की असली ताकत है।


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