भिवंडी मनपा चुनाव में उम्मीदवारों के बीच PA की मांग बढ़ी

एक- दो पीए से भी समय पर नहीं हो पा रहा काम

भिवंडी। भिवंडी महानगरपालिका चुनाव का बिगुल बजते ही शहर का सियासी माहौल पूरी तरह गरमा गया है। चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचना जारी किए जाने के साथ ही इच्छुक उम्मीदवारों की गतिविधियां तेज हो गई हैं। नामांकन प्रक्रिया से पहले विभिन्न प्रकार की एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) और दस्तावेज जुटाने की अनिवार्यता ने उम्मीदवारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसका सीधा असर यह देखने को मिल रहा है कि पालिका के अलग-अलग विभागों में सुबह से शाम तक उम्मीदवारों और उनके समर्थकों की भीड़ लगी हुई है। चुनाव आयोग द्वारा संपत्ति कर, पानी कर, निर्माण विभाग, अग्निशमन, स्वास्थ्य, नगर रचना विभाग सहित कई विभागों से एनओसी अनिवार्य किए जाने के कारण उम्मीदवारों को लगातार दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।,खासकर पहली बार चुनाव लड़ने वाले इच्छुक उम्मीदवारों के लिए यह प्रक्रिया काफी जटिल साबित हो रही है।

इस बीच एक नया चलन भी सामने आया है। धनाढ्य और प्रभावशाली उम्मीदवारों ने अपने चुनावी प्रबंधन को सुचारू रूप से चलाने के लिए पर्सनल असिस्टेंट (PA) की नियुक्ति शुरू कर दी है। ये PA उम्मीदवारों के लिए दस्तावेज तैयार करने, फॉर्म भरने, विभागों में फाइल जमा करने, अधिकारियों से समन्वय रखने और समय पर एनओसी हासिल करने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

हालांकि, काम का दबाव इतना अधिक है कि एक PA भी उम्मीदवार के लिए नाकाफी साबित हो रहा है। ऐसे में कुछ उम्मीदवारों ने अतिरिक्त PA या सहायक रखने शुरू कर दिए हैं। सूत्रों के अनुसार, चुनावी सीजन को देखते हुए अनुभवी PA की मांग अचानक बढ़ गई है और कई जगहों पर इनके पारिश्रमिक में भी इजाफा हुआ है।

पालिका परिसर में सक्रिय लोगों का कहना है कि इस बार चुनावी प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक कागजी और तकनीकी हो गई है। हर विभाग की अपनी शर्तें और समयसीमा होने के कारण उम्मीदवारों को संगठित ढंग से काम करना पड़ रहा है। इसी वजह से पेशेवर ढंग से काम करने वाले PA और चुनावी मैनेजरों की भूमिका अहम हो गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में जैसे-जैसे नामांकन की अंतिम तारीख नजदीक आएगी, उम्मीदवारों की भागदौड़ और बढ़ेगी। इसके साथ ही PA, चुनावी सलाहकार और दस्तावेज विशेषज्ञों की मांग भी और तेज होने की संभावना है। कुल मिलाकर, भिवंडी मनपा चुनाव ने न केवल सियासी सरगर्मी बढ़ाई है, बल्कि इससे जुड़ी एक नई “चुनावी अर्थव्यवस्था” को भी जन्म दे दिया है, जिसमें PA और चुनावी सहयोगियों की भूमिका अब बेहद महत्वपूर्ण होती जा रही है।

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