कविता हो या साहित्य आता कहां से है
- सुनील कुमार, जिला ब्यूरो चीफ रोहतास
- Sep 13, 2026
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रोहतास । हिंदी दिवस की पावन वेला में सभी देशवासियों को हिंदी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए जिले के काशी काव्य संगम रोहतास जिला संयोजक कवि साहित्यकार सुनील कुमार रोहतास बताते हैं कि हमारी भारतीय संस्कृति में शब्द को ब्रह्म मान कर पूजा गया है,क्योंकि इसमें कभी बुरा अशुभ भद्दा गलत गंदा नहीं सोचा जाता। यही कारण है हमारी भारतीय संस्कृति में सारे मंत्र श्लोक प्रार्थनाएं आरती अर्चनाएं आशीर्वाद पद्य में अर्थात कविता के रूप में होते हैं। सत्य यही है की भाव, कविता की ही नहीं साहित्य की आत्मा होते हैं और भावों की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति कविताओं में ही होती है।
काव्य लेखन का मूलधार या साहित्य का कह सकते हैं विशेषकर कविता की उर्वरक जमीन वेदना संवेदना अनुभूति स्पर्श आदि होते हैं। इनके अभाव में काव्य लेखन संभव ही नहीं हो सकता है। प्रसिद्ध कवि लेखक सुमित्रानंद पंत ने बहुत सुंदर शब्दों में इसे इन पंक्तियों में स्वीकारा है -
"वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान,
निकलकर आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।"
और अधिक गहराई में जाएं तो वेदव्यास बाल्मिकी कालीदास सूर कबीर तुलसी चंद्रकुंवर बर्थवाल महादेवी वर्मा गोपालदास नीरज जी के जीवन का अध्यन किया जा सकता है। महादेवी वर्मा प्रिंसिपल थीं नीरज जी प्रोफेसर थे। गरीबी निर्धनता का दुख नहीं था लेकिन उनके जीवन में वेदना की गहरी अनुभूति थी यदि ये न होती तो इतनी महान गहरी स्पर्शीय रचनाएं न लिख पाते। वेदना संवेदना स्पर्श अनुभूति जितनी गहरी होगी भाव उतने ही स्पर्शी सुंदर रचना को जन्म देते हैं। यह तभी महसूस होता है जब कविता कानो से नहीं दिल से सुनी जाती हो।
कविता मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का सबसे सुंदर रूप होती है। तभी कहा है --
"कविता वह कल्पना है जो विचार को व्योम कर देती है, कविता वह श्रृष्ठि है जो श्रृष्ठी को ओम कर देती है,
कविता शकुंतलम है कविता ही मंगलम है कविता ही सत्य शिवम सुंदरम है।"
शब्द और भाषा यदि साहित्य की जमीन है तो कविता उस पर खड़ी किसी सुंदर ईमारत की तरह होती है। और यही सत्य भी है की कविता के बिना साहित्य मृत प्राय होता है।
किसी ने कहा भी है --
"गीत जब मार जाएंगे फिर यहां क्या रह जाएगा
इक सिसकता आंसुओं का बस कारवां रह जाएगा
प्यार की धरती जब यहां बंदूक से बांटी जाएगी
एक मुर्दा शहर हम सबके दरमियान रह जाएगा।"
जब चिंतन मनन मंथन का उद्वेलन चरम पर होता है तब किसी पहाड़ी से निकलते मीठे पवित्र पावन जलस्रोत की तरह शुद्ध सुंदर निकल कर आती है कविता। कविता के उदगम के आधार को बड़ी खूबसूरती के साथ व्यक्त किया है इन शब्दों में --
"काव्य मन वीणा की एक झंकार है
काव्य जीवन का मधुर आधार है
सत्यम शिवम सुंदरम की है आराधना
काव्य अपने प्राण का शृंगार है।"
आजकल कविता लिखना बहुत आसान बन गया तभी किसी छापाखाने से जैसे बेभाव निकल कर आ रही है कविता। जैसे इसके लिए कुछ सोचने समझने की जरूरत ही न हो। कविता फूलों की सेज पर या आराम से कुर्सी पर बैठकर नहीं लिखी जा सकती। यदि कविता लिखना, कविता की रचना करना इतना ही आसान होता तो सारे धनी संपन्न पैसे वालों की गुलाम होती रखैल होती कविता। सारे ग्रंथ सारी कविताएं आज उनकी ही होतीं। इसलिए कवि ने लिखा भी है --
"वश में अगर होता मेरे नित्य करता काव्य रचना
मगर नहीं है यह वश में मेरे रच सकूं जो गीत कोई
मैं नहीं स्रष्टा जगत का रच सकूं जो सृष्टि कोई
मैं कहां गीत लिखता वो तो मुझसे लिखवाता है कोई।"
अक्सर कहा जाता है इस पर कविता लिखो,उस पर कविता लिखो। अब कोई पूछे जब भाव ही नहीं आए, स्वतः ही भाव उत्पन्न नहीं हुए तब कविता शब्दों को जोड़ तोड़ कर ही तो बनाई जाएगी। अब सावन की कविताओं को बिना सावन के उमड़ते घुमड़ते मेघों की सुंदरता देखे, बिना रिमझिम बारिश की बूंदों को महसूस किए, बिना सावनी हवाओं के स्पर्श के बिना, कैसे बादलों पर, सावन पर कैसे सुंदर रचना लिखी जा सकती है।
हरिवंश राय बच्चन जी जी से किसीक्ष ने पूछा था की मधुशाला का जन्म कैसे हुआ, किस तरह से दिमाग में उपजी मधुशाला। तब उन्होंने बताया अपने कुछ मित्रों के साथ ट्रेन में बैठकर लंबी यात्रा पर हम जा रहे थे। ढलती शाम के समय हंसते बोलते मजाक करते समय कट रहा था। तभी किसी ने कहा चलो यार मदिरा की बोतल निकालो। फिर जो सबका पीना पिलाना शुरू हुआ तो सबके जीवन के दुख दर्द हंसी खुशी सुख वेदना संवेदना के क्षण, बाहर आने लगे बस उन्हीं भावों ने इतना स्पर्श किया मुझे की वहीं बैठे बैठे "मधुशाला" ने जन्म लेना शुरू किया।
मेरे साथ भी कुछ घटनाएं ऐसी ही घटती है जब कार्यक्रम के लिए जाता हूं तो भाव उमडते है एवं स्वत: प्रस्फुटित कविताएं सुनाता हूं। कुल मिलाकर भावों से कविता जन्म लेती है।
आज आश्चर्य होता है विचारों में भावों में व्यक्तित्व में कहीं वेदना, संवेदना, स्पर्शिय छमता, मन में कोई कोमलता नजर नहीं आती,फिर भी कविता जन्म लेती नजर आती है।
कविता का उद्देश्य आधार तालियां बजवाना नहीं ह्रदय को स्पर्श करना होता है। मीका, हनी सिंह कैसा भी गा लें वो शब्द कानों से बाहर निकल जाएंगे लेकिन लता मंगेशकर जब गाती थीं,तो उनके स्वरों की कोमलता, स्पर्श, संवेदना, भावात्मकता शब्दों को अमरत्व प्रदान कर देती थी। नीरज,रामनाथ अवस्थी, भारत भूषण जब रचना पाठ करेंगे तब पिन ड्रॉप साइलेंट छा जाएगा क्योंकि तब शब्द स्वर कानों में नहीं दिल में उतर रहे होते हैं। प्रेमचंद ने भी कहा था मैं कहानी उपन्यास लेख बनाता नहीं हूं अपने आसपास के ग्रामीण परिवेश से उठाता हूं। यही साहित्य का अंतिम सत्य होता है।


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