फूट डालो शासन करो (काले अंग्रेजों) की नीति विरुद्ध राष्ट्रवादियों का राष्ट्र के कोने-कोने से विरोध

यूजीसी वापसी, एस सी एस टी एक्ट सहित तमाम जातिवादी कानूनों की समापन व आर्थिक आधार पर संरक्षण एवं योग्यता का सम्मान की मांग 

 लोकतंत्र की मंदिर में अपराधियों का कब्जा, राष्ट्र में गृहयुद्ध का आसार तेज

बिहार------ राष्ट्र के कोने-कोने से राष्ट्रवादियों द्वारा यूजीसी व एस सी एस टी एक्ट सहित तमाम जातिवादी कानूनों की समापन हेतु काले अंग्रेजों (राष्ट्रद्रोहियों) के विरुद्ध धरना प्रदर्शन जारी, आर्थिक आधार पर संरक्षण एवं योग्यता का सम्मान की मांग, राष्ट्र में गृहयुद्ध का आसार तेज।

 आपको बताते चलें की राष्ट्र की संविधान के तहत राष्ट्र में लिंग, जाति, धर्म व क्षेत्र आधारित द्वेष अपराध है। पर राष्ट्र के तथाकथित नेतृत्वकर्ताओं द्वारा सत्ता की लोलुपता में अंग्रेजों नीति फूट डालो शासन करो की नीति के तहत ऐसे कानून लोकतंत्र की मंदिर में सर्वसम्मति से पारित किया गया व दिन प्रतिदिन ऐसे विद्वेषपूर्ण कानूनों में बढ़ोतरी किया जा रहा है। जबकि राष्ट्र की संविधान के तहत सरकार द्वारा राष्ट्र के नागरिकों को लिंग या जाति, धर्म के आधार पर उनके अधिकार छीने जाते हैं, तो इसे संवैधानिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन और अलोकतांत्रिक माना जाएगा। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 स्पष्ट रूप से सरकार को किसी भी नागरिक के खिलाफ केवल धर्म, मूलवंश, जाति/वर्ण, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है। इसके अलावा, अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, ऐसा कोई भी कानून पूरी तरह असंवैधानिक हैं। फिर भी राष्ट्र के तथाकथित नेतृत्वकर्ताओं द्वारा सत्ता की लोलुपता में संविधान की गला घोंट लिंग, जाति, धर्म व क्षेत्र आधारित कानूनों को लोकतंत्र की मंदिर में सर्वसम्मति से पारित किया गया व दिन प्रतिदिन बढ़ाया जा रहा है।

न्यायपालिका भी दिख रही असमर्थ 

वर्ण या जाति के आधार पर अधिकारों को छीनने से समाज व राष्ट्र में गहरा विभाजन पैदा हो गया है। जिससे व्यापक विरोध प्रदर्शन, नागरिक असंतोष, दंगे या गृहयुद्ध जैसी स्थितियां पैदा हो चुकी है, सत्ता की लोलुपता में बनाए जा रहे कानूनों से भविष्य में देश का लोकतांत्रिक ढांचा नष्ट हो जाएगा।राजनीतिक प्रभाव से सामाजिक अशांति और गृहयुद्ध की स्थिति और एक तानाशाही या दमनकारी शासन में बदल जाएगा। 

संवैधानिक रूप से भारत में न्यायपालिका उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय संविधान की रक्षक है। नागरिक अपने अधिकारों की बहाली के लिए अनुच्छेद 32 (सुप्रीम कोर्ट) या अनुच्छेद 226 (हाई कोर्ट)के तहत सीधे अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। न्यायालय को ऐसे किसी भी सरकारी आदेश या कानून को शून्य या असंवैधानिक घोषित कर रद्द करने की अधिकार है। पर सत्ता की मद में चूर हो राष्ट्रद्रोहियों द्वारा, न्यायपालिका के आदेश को ही अध्यादेश लाकर शून्य कर दिया जा रहा है। जिस की स्पष्ट होता है कि राष्ट्र की न्यायपालिका राष्ट्रवादियों को न्याय देने में असमर्थ हैं।

अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव वैश्विक प्रतिबंध भी शून्य, गृहयुद्ध का आसार तेज 

मानव अधिकारों के ऐसे गंभीर उल्लंघन पर संयुक्त राष्ट्र (UN) और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन कड़ा रुख अपना सकते हैं। देश पर आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जिससे देश वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ जाएगा।मानवाधिकारों का उल्लंघन यह कदम 'मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा' (UDHR) के खिलाफ हैं, पर वर्तमान समय में सब शून्य है। जिससे राष्ट्रवादियों के पास भारी संघर्ष व विरोध के सिवा कोई विकल्प दिखता नहीं। पर सत्ता की मद में चूर सरकार द्वारा कुचलने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे राष्ट्र में गृहयुद्ध का आसार तेज है।

 योग्यता की बलात्कार राष्ट्र हित में नहीं 

सत्ता की लोलुपता में जातिगत आरक्षण के आधार पर 90% अंक लाने वाला अयोग्य और -40% अंक लाने वाला योग्य घोषित कर योग्यता का बलात्कार किया जायेगा, तो राष्ट्र को बर्बाद होने से कोई रोक नहीं पायेगा।राष्ट्रवादियों को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है।

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