आज भी जीवित है परंपरा, नन्हे बच्चे झूले झूलकर मना रहे सावन
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- Aug 04, 2026
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संवाददाता सूचित पाण्डेय की रिपोर्ट
रामपुर(कैमूर)----- आधुनिकता के दौर में भी रामपुर प्रखंड के खरेंदा गांव में सावन की परंपरा आज भी उसी पारंपरिक ढंग से निभाई जा रही है। यहां पीपल और बरगद के पेड़ों में बंधे झूलों पर छोटे-छोटे नन्हे बच्चे झूलते हुए सावन के गीत गा रहे हैं।
गांव की महिलाएं रंग-बिरंगे झूलों को रस्सियों से बांधकर सजाती हैं। बच्चे नए कपड़े पहनकर "कजरी, बारहमासा और सावन के गीत" गाते हुए झूले का आनंद ले रहे हैं। दादी-नानी बच्चे को झूला झुलाते हुए सावन की कहानियां भी सुना रही हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि खरेंदा गांव में ये परंपरा कई दशकों से चली आ रही है। मानसून के आगमन और हरियाली का स्वागत इसी तरह झूला झूलकर किया जाता है। मोबाइल और टीवी के जमाने में भी बच्चे इस पारंपरिक खेल को लेकर काफी उत्साहित दिखे।
ग्रामीणों ने बताया कि झूला सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि ये गांव की एकता और संस्कृति की पहचान भी है।


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