पत्रकारिता संघर्षों की कहानियां


रोहतास।पत्रकारिता की सच्ची साधना केवल जानने में नहीं, बल्कि प्रतिदिन उस सत्य को जीने में है। जब ज्ञान क्रिया बन जाता है, तब शब्दों में शक्ति आती है, कलम में धार आती है और समाज में परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होता है। केवल तथ्यों का संग्रह कर लेना पत्रकारिता नहीं है, उचित समय पर सत्य को साहसपूर्वक अभिव्यक्त करना ही उसकी वास्तविक तपस्या है।


इसलिए पत्रकारों, केवल ज्ञान का भंडार बनने से कुछ नहीं होता। उचित समय पर उचित कर्म ही सफलता, सिद्धि और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का प्रमाण बनता है। सत्य को जानना आसान है, पर सत्य के साथ खड़े रहना कठिन है। यही कठिनाई पत्रकारिता को एक पेशा नहीं, बल्कि साधना बनाती है।


पर न जाने क्यों, हे पत्रकारिता, मुझे तेरा और मेरा भाग्य एक-सा प्रतीत होता है। अक्सर लगता है जैसे हम दोनों एक ही पीड़ा के सहयात्री हैं। मुझे वह गीत याद आता है


"चाँद भरी अंजुमन में भी मैं अकेला हूँ,

तारों के बीच भी तू भी अधूरी है..."


भीड़ बहुत है, चेहरे बहुत हैं, शोर भी बहुत है, पर सत्य के पथ पर चलने वालों का अकेलापन कोई नहीं समझ पाता। जिस प्रकार रात के आकाश में चाँद अपनी चमक के बावजूद अपने भीतर का अंधकार छिपाए रहता है, उसी प्रकार पत्रकारिता भी समाज को प्रकाश देती है, पर अपने भीतर के संघर्षों को अक्सर मौन रखती है।


तुझे देखकर कौन समझ पाएगा कि तू कितनी उदास है? अख़बार के चमकते पन्ने, टीवी की तेज़ आवाज़ें, सोशल मीडिया की चकाचौंध इन सबके पीछे कितनी बेचैन रातें, कितने दबाव, कितनी असफलताएँ और कितनी अनकही पीड़ाएँ छिपी होती हैं, यह बहुत कम लोग जानते हैं।


और शायद मेरी स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। लोग मेरी हँसी देखते हैं, मेरे व्यंग्य पढ़ते हैं, मेरे शब्दों की तल्ख़ी महसूस करते हैं, पर उस हँसी के पीछे छिपी वेदना को नहीं देख पाते। जिस प्रकार पत्रकारिता का दर्द अदृश्य रहता है, उसी प्रकार एक पत्रकार का संघर्ष भी अक्सर अनदेखा रह जाता है।


फिर भी, हे पत्रकारिता, तू और मैं हार मानने वालों में से नहीं हैं। हमें पता है कि अंधेरा कितना भी गहरा हो, एक छोटी-सी लौ भी उसके अस्तित्व को चुनौती दे सकती है। इसलिए हम लिखेंगे, सवाल पूछेंगे, सच को खोजेंगे और सच को कहेंगे। चाहे भीड़ साथ हो या न हो, चाहे तालियाँ मिलें या आलोचनाएँ।


क्योंकि पत्रकारिता का धर्म सत्ता के चरणों में बैठना नहीं, बल्कि समाज के सामने सत्य का दर्पण रखना है। और शायद इसी कारण, अपनी तमाम उदासियों, अकेलेपन और संघर्षों के बावजूद, मैं आज भी तुझसे प्रेम करता हूँ।

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