समय यही है पहचान लीजिए, युगपुरुष को जान लीजिए"


अनिल कुमार सिंह  

 

  ब्यूरो चीफ भोजपुर । स्वामी  सच्चिदानंद अवतार युग चेतना पुरुष परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज".. एक ऋषि है, ऋषित्व का जीवन जीते है। सप्तऋषियों के स्वामी है। जन जन के कल्याण के लिए तपस्यारत हैं। जिनकी कुंडलनी चेतना जाग्रत है। जिनका कोई शरीरधारी गुरु इस धरती पर नहीं है.. उनकी ईष्ट सिर्फ माता आदिशक्ति जगत जननी जगदंबा माँ भगवती हैं। उन्होंने साक्षात माँ भगवती के दर्शन प्राप्त किए हैं, और वह जब चाहे तब हर पल माँ के दर्शन प्राप्त कर सकते हैं। माँ भगवती ने ही उन्हें 'शक्तिपुत्र' यह नाम प्रदान किया है। इनका जन्म उतरप्रदेश के फतेहपुर जिले में हुआ है,कलयुग की भयावहता के बीच सतयुग की स्थापना करने के लिये।इन्होंने विश्व धर्म जगत को ससम्मान चुनौती दी है। 


उनके द्वारा त्रिवेणी से भी पवित्र तीन धाराओं  का गठन किया गया है -पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम,भारतीय शक्ति चेतना पार्टी,भगवती मानव कल्याण संगठन; जिसका उद्देश्य समाज को नशे और मांसाहार से मुक्त चरित्रवान शक्ति साधक बना कर मनुष्य के तीन मूल कर्तव्यों धर्मरक्षा, राष्ट्ररक्षा और मानवता की सेवा के लिए तैयार करना है। 


मध्यप्रदेश के शहडोल जिले के ब्यौहारी तहसील में मऊ नामक एक छोटे से ग्राम में उन्होंने पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम की स्थापना की है जहाँ पिछले 30 वर्षों से अखंड दुर्गा चालीसा  का पाठ समाज कल्याण हेतु अनंत काल के लिए चल रहा है। वहाँ पर  उन्होंने मुलध्वज मंदिर  की भी स्थापना की जहां समाज के समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

गुरुवर श्री ने 108 महाशक्ति यज्ञों का संकल्प लिया है जो समाज की दिशा धारा बदलने वाला होगा। जिसमें से 8 महाशक्ति यज्ञों को समाज के अलग अलग क्षेत्रों में किया गया है।100 महाशक्ति यज्ञ शेष हैं जो सिद्धाश्रम धाम में ही पूर्ण होने हैं जिसके लिए यज्ञस्थल का निर्माण क्रम जारी है । 


हर वर्ष शारदीय नवरात्र के अष्टमी नवमी और विजयादशमी को तीन दिवसीय शक्तिचेतना जनजागरण शिविर का आयोजन किया जाता है जहाँ लाखों की संख्या में माँ के भक्त उपस्थित होकर तीन दिव्य है महाआरतियों का लाभ प्राप्त करते जिसके विषय में गुरुवर श्री ने बताया है कि 108 दिव्य महाआरतियों में सम्मलित होने वाले भक्तों को उस सिद्धाश्रम धाम की प्राप्ति होगी तथा कम से कम 11 दिव्य महाआरती का लाभ लेने वाले मृत्यु के बाद पुनः इस यात्रा से जुड़ जाएंगे।


भगवती मानव कल्याण संगठन का नारा है -'जाती धर्म का भेद मिटा दो, माता का परिवार बना लो'।  इस संगठन के द्वारा घर घर आरती - चालीसा का क्रम समाजहितार्थ निःशुल्क संपन्न कराये जाते है। यह संगठन ‘माँ की ऊर्जाशक्ति को लेकर समाज में धीरे-धीरे चैतन्यता डाल रहा है। 


भारतीय शक्ति चेतना पार्टी का गठन देश के भ्रष्ट नेताओं को सबक सीखने और देश की राजनीति में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए किया गया है। श्री शक्तिपुत्र जी महाराज का कथन है कि आने वाले समय में कोई शक्ति साधक या शक्ति साधिका ही लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराएगा।


शक्तिपुत्र जी महाराज कहते हैं कि आज समाज में पाँच महामारियाँ हैं। यदि ये पाँच महामारियाँ दूर हो जायें, तो समाज की सभी समस्याओं का समाधान हो जाये। वे पाँच महामारियाँ हैं- नशा, मांस, भ्रष्टाचार, सम्प्रदायवाद और नास्तिकता।


नशा मनुष्य के पतन का मूल कारण है। यदि समाज को केवल नशामुक्त कर दिया जाये, तो समाज की जितनी समस्यायें हैं, उनमें तत्काल सुधार होना प्रारम्भ हो जायेगा। नशे से अपने आपको मुक्त करो, अपने बच्चों को मुक्त करो, समाज को मुक्त करो। 


माँसाहार पतन का दूसरा मुख्य कारण है। जिस तरह का हमारा आहार होगा, वैसे ही हमारे विचार बनेंगे। माँस का भक्षण करने वाला अगर वास्तव में कह दिया जाये, तो न तो अपने बच्चों से प्रेम करता है, न अपने परिवार से प्रेम करता है और समाज से तो प्रेम करेगा ही नहीं। अपने निज स्वार्थ के लिए तथा जीभ के क्षणिक स्वाद के लिए क्यों किसी जीव की हत्या करना ? ये एक महापाप है। देवी-देवताओं के नाम पर जो बलि दी जाती है, यह तो सबसे बड़ा महापाप है। उन मन्दिरों पर कभी शक्तियाँ वास नहीं करतीं जहाँ किसी जीव की बलि दी जाती है।


भ्रष्टाचार पतन का तीसरा मुख्य कारण है। हम भ्रष्टाचारी और अधर्मी राजनेताओं को सहयोग देना बन्द कर दे।समाज को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने का सतत प्रयास करे।भ्रष्टाचार का धन अपने घर में लाने की अपेक्षा भूखों मर जाना ज्यादा अच्छा है।


चौथी महामारी सम्प्रदायवाद है। मानव सभ्यता के लिए जातिगत भेदभाव एक कलंक है। हमें समाज में सभी जाति, धर्म, सम्प्रदाय को एकसमान मान करके चलना चाहिए। जातीयता के, सम्प्रदायवाद के जितने संगठन चलेंगे, उतना ही देश में अशान्ति फैलेगी।


समाज की पांचवी सबसे बड़ी बिडम्बना है- नास्तिकता। मूर्तिपूजा  का विरोध करने वाले घोर अज्ञानी हैं। हर कल में मूर्ति पूजा होती आई है।


भगवती मानव कल्याण संगठन के जो लक्ष्य हैं कि हम इन महामारियों को दूर कर रहे हैं और जिस दिन ये महामारियाँ जितनी दूर होती चली जायेंगी, समाज में सहजभाव से उतना सुधार होता चला जायेगा।


अपने सुख दुख  से ऊपर उठकर आज जरूरत है युगपरिवर्तन के इस यात्रा से जुड़ने की जिसके संचालक स्वयं सचिदानंद अवतार हैं। युगवंदनीय परम पूजनीय परमहंस योगिराज श्री शक्तिपुत्र महाराज के सानिध्य में अपने जीवन के साथ दुसरो के जीवन मे परिवर्तन लाने का यह परम सौभाग्य बार बार नही आता। इससे बड़ी बात क्या होगी कि हर घर मे माँ की ज्योति जले, हर घर मे माँ का ध्वज लहराए, हर घर मे माँ गुरुवर के जयकारे गूंजे, और घर मे लोग एक दूसरे के साथ सुख शांति से सद्भावना पूर्ण जीवन व्यतीत करे।


आज का भौतिकतावाद का समाज बहुत ही व्यस्त हो चुका है , इतनी व्यस्तता आ चुकी है कि उस व्यस्तता में दो मिनट का समय निकालना भी मुश्किल हो गया है , इसलिये सरल से सरल विधि और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण विधि गुरुवर ने अपने शिष्यों को प्रदान किया है- ऊँ जगदम्बिके दुर्गायै नमः ' मन्त्र , जिसे आप चलते - फिरते , उठते - बैठते , सोते - जागते और शुद्धता - अशुद्धता , किसी भी अवस्था में मानसिक जाप कर सकते हैं। जिसे स्वयं माँ द्वारा गुरुवर को प्रदान किया गया था।गुरुवार व्रत जिसे सभी व्रतो का राजा कहा गया है केवल गुरुवार का व्रत रहने से ही सभी व्रत का लाभ मिल जाता है। माँ और ॐ का क्रमिक उच्चारण, प्रणायाम और योग को माध्यम बना कर ही हम उस रास्ते पर चलने की पात्रता प्राप्त कर सकते हैं जिससे हमें अपनी आत्मा का ज्ञान प्राप्त होगा। 


हमें नित्य ब्रह्मुहुर्त में उठना चाहिए और माँ भगवती की साधना आराधना करनी चाहिए। मनुष्य का मूल लक्ष्य आत्मचेतना की प्राप्ति करके परमसत्ता को प्राप्त करना है। इसके लिए दो मार्ग है - परमसत्ता की भक्ति और परोपकार। आज बच्चे और युवा तनावग्रस्त हैं। हमें उन्हें सन्मार्ग पर लाना होगा। 'माँ' की भक्ति के अलावा और कोई मार्ग नहीं है। आप स्वयं संस्कारों का जीवन जियें और सत्कर्म करना प्रारंभ कर दें। आने वाली पीढ़ी स्वत: सुधरती चली जाएगी।


जिस शरीर के साथ हम पैदा हुए उसके लिए हम जिम्मेदार नहीं, परन्तु जिस चरित्र, व्यक्तित्व और किरदार के साथ हम विदा होंगे, उसके लिए हम खुद ही जिम्मेदार होंगें! आत्मकल्याण और जनकल्याण को ध्यान में रखते हुए हम अपनी आत्मा के नजदीक भी पहुंच सकते है और माँ की कृपा भी प्राप्त कर सकते हैं।

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