धर्मरक्षा के लिए एक ऋषि की चुनौती - सीमा योगभारती


अनिल कुमार सिंह

 

ब्यूरो चीफ भोजपुर।हमारे ऋषि मुनियों ने एक परंपरा दी थी कि साधु, संत, ऋषि, मुनि, प ब्रह्मचारियों का जीवन किस तरह का होना चाहिए। लेकिन आज समाज में ये उपाधियां धर्म से शून्य व्यक्ति भी अपने नाम के आगे लगाकर समाज को लुट रहा है। उनकी निगाहें केवल समाज के दिये दान पर होती है। हर तरह से वे धर्म का अनादर कर रहे है। अधर्मी अन्यायियों का जीवन जीने वाले धर्मगुरु जो धनकुबेरों के चाटुकार बने बैठे है, राजसत्ताओं के गुलाम बने बैठे है वे भावनावान भक्तों की भावनाओं का दुरुपयोग कर रहे है और हमारे समाज को रसातल में लेते जा रहे है। उन सभी अधर्मी धर्मगुरुओं को धर्मसम्राट युगवंदनीय युगचेतना पुरुष परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज द्वारा ससम्मान खुली चुनौती दिया गया है। गुरुवर ने कहा है कि वास्तव में तुम्हारे पास सत्य है, धर्म है, वास्तव में तुमने अपने इष्ट के दर्शन प्राप्त किए है जिसका ज्ञान तुम समाज के बीच दे रहे हो तो आओ एक बार धर्म रक्षा के लिए सत्य के परीक्षण हो कि तुम्हारे पास ध्यान, समाधि में जाने की कितनी सामर्थ्य है तुमने अपने इष्ट के दर्शन प्राप्त किए है या नहीं, तुम झूठ बोल रहे हो या सत्य, तुम कितना चरित्रवानों का जीवन जीते हो विज्ञान के पास वह सामर्थ्य है कि इसका परीक्षण किया जा सके। शक्तिपुत्र जी महाराज ने उन सभी धर्म गुरुओं का आवाहन किया है और गुरुवर स्वयं उस परीक्षण से गुजरने के लिए तत्पर है। विश्व धर्म को दी गई यह चुनौती किसी गर्व घमंड से नहीं बल्कि मानवता की आँखे खोलने के लिए है।इससे समाज दिशाभ्रमित होने से बच जाएगा और सत्य असत्य को पहचान सकेगा। 


इस भूतल पर कोई नहीं जो गुरुवर की चेतना का सामना कर सके वे एक चेतनावान ऋषि हैं जिनकी पूर्ण कुंडलिनी चेतना जागृत है। उन्होंने अपनी साधनात्मक तपबल की चुनौती देते हुए कहा है कि "विश्व का कोई भी कार्य हो जाए एक तरफ समस्त धर्माचार्य हो जाये और एक तरफ मै केवल मां शब्द को लेकर बैठूंगा। अगर तुम्हारे पास साधनात्मक तपबल नहीं है तो अब भी सुधर जाओ अगर नहीं सुधरोगे तो भगवती मानव कल्याण संगठन के सदस्य तुम्हे एक न एक दिन धूल चटाकर रहेंगे। इस तड़पती तड़पती कराहती मानवता के लिए यह आवश्यक है कि सत्य का परीक्षण हो"। नहीं तो गुरुवर ने कहा है कि -

"जब चलेंगी आंधियां मां के ममता प्यार की

 काल के वट वृक्ष ढहकर धूल में मिल जाएंगे

फिर याचना नहीं रण होगा संग्राम महाभीषण होगा"।

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