कटुता और नफरत का जन्म दाता आरक्षण देश के आंतरिक ढांचे को कर रहा खोखला

जातिगत आरक्षण युक्त कानून कुर्सी को प्राप्त करने के लिए बनाना देशद्रोह नहीं तो और क्या है

वरिष्ठ संवाददाता श्याम सुंदर पाण्डेय  की लेखनी से 

दुर्गावती (कैमूर)-- जिसकी जाती का नाम लेने से एससी एसटी एक्ट लागू हो जाते हैं उसका नाम है आरक्षण, लेकिन बड़े खुशी और हर्ष के साथ नफरती आरक्षण के कानून का सहारा लेने के लिए दफ्तरों में जाति प्रमाण पत्र खुशी खुशी बनवाते हैं आरक्षण धारी, लेकिन जाति का नाम लेने पर होते हैं नाराज। यह कानून राजनेताओं की सोची समझी राजनीति के चलते सनातन धर्म में एक लकीर पैदा कर दिया है। जिसके चलते एक दूसरे को देखकर लोगों की गुर्राने और नफरत करने का सिलसिला कम होने की बजाय दिन दूना और रात चौगुन बढ़ रहा है। अंग्रेजों की तरह बाटो और शासन करो कि यह राजनीति देश को कितना नुकसान पहुंचाएगी और पहुंच रही है, जिसका अंदाजा अभी और आने वाले भविष्य में कितना भुगतना होगा नहीं कहा जा सकता। गरीबी की तुलना किसी जाति को देखकर नहीं किया जा सकता। यदि सच पूछा जाए तो गरीबों के नाम पर सुविधा देने का जो तरीका है वह देश को बांटने के तरीका के रूप में बदल चुका है जिससे हमारी कुर्सी बरकरार रहे। देश द्रोह के पैमाने की यदि हम बात करें तो जो कानून देश में अशांति फैलता हो नफरत फैलता हो देश को कमजोर करता हो वह देशद्रोह के रूप में क्या नहीं आता क्या यह आपसी प्रेम फैलाने वाला है या गरीबी मिटाने वाला या देशद्रोह फैलाने वाला या जाति में बांटने वाला कहना उचित नहीं होगा। इस कानून के चलते आज द्वेष समाज में आज द्वेष इस तरह से बढ़ गई है कि कोई धर्म पर  उंगली उठाता है कोई किसी के धर्म को ही गाली देता है तो कोई अंतरजातीय विवाह का सपना देखता है तो कोई ब्राह्मण लड़कियों पर ही सवाल उठा देता है और शादी करने तक का सपना देख डालता है। यह सब नफरती  कानून किसने बनाया और क्यों बनाया क्या यह देश को कमजोर नहीं कर रहा है और क्या समाज को बांट नहीं रहा है। संविधान सबको साथ लेकर चलने का संकल्प लेता है समानता का अधिकार देता है तो फिर भेदभाव युक्त कानून कुर्सी को प्राप्त करने के लिए बनाना देशद्रोह नहीं है तो क्या है। इसलिए सरकार को चाहिए कि देश के अंदर जो भी कानून समाज को बटता हो भाईचारे को कमजोर करता हो उस पर तत्काल रूप प्रतिबंध लगाना चाहिए और संविधान में संशोधन करके समानता के अधिकार के तहत समान नागरिक संहिता लागू कर देना चाहिए तब जाकर समाज में समरसता भाईचारा और पारदर्शिता कायम की जा सकती है। यदि सचमुच सरकार भेदभाव युक्त कानून आरक्षण या धार्मिक कोई नहीं बनाई होती तो आज देश में जनता के बीच भाईचारा की जगह नफरत नहीं कायम होता इसलिए इसके जन्मदाता राजनेताओं को कहना अनुचित नहीं होगा।

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