शिव हृदयंगम करने का महीना है सावन


   रोहतास । साहित्यिक सर्जनाओं और रचनाओं की दृष्टि से समृद्ध सावन का महीना हरियाली से लबालब लबरेज आम जनजीवन में अपरम्पार खुशियां लाने वाला महीना माना जाता है। काशी काव्य संगम रोहतास जिले के जिला संयोजक कवि लेखक सह साहित्यकार सुनील कुमार ने बताए कि भारतीय चलचित्र जगत में बहारों के मौसम के रूप में बहुचर्चित सावन में मौसम मनभावन और सुहावना रहता है और हर हृदय उल्लासित , उमंगित , तरंगित और हर्षित रहता हैं । लोक जीवन में प्रेम , माधुर्य, मान मनौव्वल , मनुहार और मिलन-जुलन का परिवेश रहता है। गीत-संगीत और साहित्य के लिए उर्वर मास सावन अपनेपन का एहसास लेकर आता है। बिछड़े साथियों और और रोजी-रोटी के चक्कर में दूर-दराज रह रहे अपनों के आने की महक लेकर आता है सावन । सज धजकर गृहणियां नौकरी शुदा गृहस्वामियों का बेसब्री से इंतजार करती नजर आती है। रिमझिम बारिश से सराबोर बहुरंगी मौसम और उसके फलस्वरूप उत्पन्न हर्ष , उल्लास और आनंद में डूबते- तैरते सम्पूर्ण लोक-जीवन के लोकरंग और सांस्कृतिक हलचलों पर साहित्यकार बरबस लेखनी चलाने को विवश हो जाते हैं। बहुरंगी मनभावन सुहावन सावन पर साहित्यिक रचनाओं की भरमार है । ऋतुराज बसंत के बाद सावन का महीना मनुष्य सहित सम्पूर्ण प्राणी जगत को आहृलादित करने वाला महीना माना जाता है। भारत की महान और विशाल साहित्यिक परम्परा में बंसत के उपरांत सावन के सुहाने मौसम पर ही साहित्यिक सर्जनाएं पाई जाती हैं।

    हमारी पांच हजार साल पुरानी महान सनातन संस्कृति और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सावन को लोकमंगल और लोक कल्याण के देवता देवाधीदेव भगवान शिव का महीना माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के इसी महीने में समुंद्र मंथन हुआ था । समुंद्र मंथन में चौदह रत्नों के साथ विष भी निकला था । इस विष अर्थात हलाहल को जटाधारी भगवान शिव गटागट पी गए थे । इसलिए इस महीने में ब्रह्मांड में व्याप्त का हर तरह के विष को अपने गलकंठ में धारण करने वाले नीलकंठ भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए लोग भजन-कीर्तन, आरती , पूजा वंदना, आराधना , जलाभिषेक , रुद्राभिषेक , यज्ञ और लम्बी-लम्बी काॅवड यात्राएं करते हैं। सावन के पवित्र पावन महीने में समस्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों सहित सम्पूर्ण शिव मन्दिरों की सजावट , भव्यता और दिव्यता अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच जाती हैं।

        बुद्धिजीवियों, चिंतकों और आध्यात्मिक चिंतन धारा में गोता लगाने वाले लोगों के लिए सावन का महीना भारतीय जीवन दर्शन और भारतीय जीवन-चरित्र के सारतत्व को समाहित किये हुए "सत्यम शिवम् सुन्दरम् के उपनिषदीय उद्गघोष पर गम्भीरता से चिंतन, मनन और ध्यान देने और हृदयंगम करने का महीना हैं। सत्यम शिवम् सुंदरम सम्पूर्ण भारतीय जनमानस का मार्ग दर्शन करने वाला आदर्श मूल्य है । भारतीय जीवन दर्शन में सत्य को ईश्वर के ससमतुल्य बताया गया है। अधिकांश भारतीय दार्शनिक एवम आध्यात्मिक परम्पराओं में यह बताया गया है कि-जब मनुष्य का हृदय प्रेममय हो जाता हैं और सत्य के ज्ञान से अभिसिंचींत होने लगता है तो उसके हृदय में ईश्वरीय सत्ता निवास करने लगती हैं। सत्य के ज्ञान से ही सद्बुद्धि और सर्वोच्च विवेक का जागरण होने लगता है। भारतीय दार्शनिक मान्यताओं का अनुसरण करते हुए महात्मा गाँधी ने भी कहा था कि- "ईश्वर ही सत्य है और सत्य ही ईश्वर है "और सत्य का साक्षात्कार होते ही हृदय प्रेममय हो जाता है। जब बसुन्धरा पर सत्य का साम्राज्य प्रवर्तित होने लगता है तो समाज का स्वरूप कल्याणकारी अर्थात शिवम् के रूप-रंग में ढलने लगता है। शाश्वत सत्य के ज्ञान में ही समाज के कल्याण और सुन्दर स्वरुप का शिल्प अंतर्निहित हैं। सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए तथा इसके निहितार्थ को समझने का प्रयास किया जाए तो यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि- जब सत्य सुन्दर होता और सुन्दर सत्य होता हैं तभी मध्यवर्ती शब्द शिवम् फलितार्थ होता हैं। हमारी तात्विक मीमांसाओं में सत्य और असत्य के मध्य बहुत झीना अंतर बताया गया है अर्थात सत्य और असत्य को विभाजित करने वाली रेखा बहुत संकीर्ण होती हैं। कभी-कभी असत्य सत्य से लाभकारी और मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण होता है जैसे एक कसाई किसी गाय का पीछा करते हुए जा रहा है और मार्ग में बैठे पथिक से गाय के जाने का मार्ग पूंछता है और प्रतिउत्तर में पथिक उचित मार्ग न बताकर कसाई को दिग्भ्रमित कर देता है तो निश्चित रूप से पथिक अपने अहिंसा धर्म का पालन करता है। अगर वह सत्य बचन का पालन करता तो निश्चित ही हिंसा का प्रतिभागी होता। निष्कर्षतः सत्य जब सबसे सर्वश्रेष्ठ सौन्दर्य तथा सौन्दर्यबोध से श्रृंगारित होता हैं तथा सौन्दर्य शाश्वत सत्य से पल्लवित पुष्पित और कुसुमित होता हैं तभी शिवम् का प्रकटीकरण होता है। कभी-कभी सत्य का प्रयोग हिंसक, अशिष्ट और अभद्र आचरण और व्यवहार का द्योतक होता हैं। जैसे अंधे लंगड़े और अपाहिज व्यक्ति का उपहास उडाते हुए उसे अंधा,लंगड़ा या अपाहिज कहकर संबोधित किया जाए। इस स्थिति में सत्य का प्रयोग तो किया जा रहा है परन्तु इसका स्वरूप निश्चित रूप से अभद्र,अशिष्ट और हिंसक हैं। भारतीय दार्शनिक मान्यताओं में मन बचन और कर्म से हिंसा पूरी तरह वर्जित हैं। इसलिए जब सत्य सुन्दर होगा और सुन्दर सत्य होगा तभी लोगों के जन-जीवन में शिवम् अर्थात कल्याण का वास्तविक वातावरण आच्छादित होगा। सुंदरता में सत्यता स्पष्ट रूप से तब परिलक्षित होती हैं जब सुंदरता का विश्लेषण व्यापक अंतर्दृष्टि और दूरदर्शिता के साथ किया जाए। एक पाश्चात्य विचारक ने सुंदरता की व्याख्या अनूठे तरह से की है। उस विचारक ने अनुसार एक चींटी उस समय सबसे खूबसूरत नज़र आती हैं जब दिवार चढ़ते गिरते हुए संघर्ष करती हैं। एक बकरी अपनी भूख मिटाने के लिए पेड़ के पत्तों को पाने और चबाने के लिए उछल कूद करते हुए जद्दोजहद करती हैं उस समय सबसे सुंदर नज़र आती हैं। एक किसान जब अपने खेत में बेहतर फसल के लिए पसीना बहाता है उस समय वह सबसे सुंदर नज़र आता है। एक मूर्तिकार पूरी तन्मयता से सुंदर मूर्ति गढ़ने में अपना जौहर दिखाता है उस समय वह सबसे सुंदर नज़र आता है। सावन का महिना शिव से हृदयांगम एवं समाहित होने का महिना माना जाता है।

रिपोर्टर

संबंधित पोस्ट