खुशनसीब को नसीब होता है रमजान का मुबारक महीना : बाबू अंसारी
- सुनील कुमार, जिला ब्यूरो चीफ रोहतास
- Mar 13, 2026
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संवाददाता पारसनाथ दूबे
डेहरी ऑन सोन रोहतास । खुशनसीब लोगों को ही रमजान का मुबारक महीना नसीब होता है। उक्त बातें रमजान में रोजा रखने वाले मो. अलीमुद्दीन अंसारी उर्फ बाबू अंसारी ने कही। उन्होंने कहा कि इस पवित्र माह में अल्लाह ताला अपनी पूरी रहमत बरसाते हैं। इस महीने में सभी सुख-सुविधाओं और अपनी पसंदीदा चीजों का त्याग कर अल्लाह की इबादत में खुद को मशगूल रखना हर मुसलमान का उद्देश्य होता है।
उन्होंने कहा कि हजरत मोहम्मद साहब को कुरान पाक का संदेश इसी महीने में प्राप्त हुआ था। उसी रोशनी में जीवन व्यतीत करना और उसकी हिदायतों का पालन करते हुए उसे अपने दिल और दिमाग में उतारना हर सच्चे मुसलमान का फर्ज है। उन्होंने कहा कि परवरदिगार की यह पाक किताब किसी एक नस्ल, वर्ग या मजहब के लिए नहीं है, बल्कि उन सभी लोगों के लिए है जो इंसानियत, नेकी और ईमान पर विश्वास रखते हैं। कुरान इंसानों को पक्षपात रहित समाज के निर्माण की प्रेरणा देता है।
रमजान में हर वर्ष रोजा रखने वाले अधिवक्ता व पत्रकार मो. तस्लीमुल हक ने बताया कि पवित्र कुरान में तीस पारों (अध्याय) का वर्णन है और रमजान के दौरान तीस दिनों में नियमपूर्वक प्रतिदिन कुरान पढ़ा जाता है। उन्होंने कहा कि रोजाना अदा की जाने वाली पांच वक्त की नमाज के अलावा इस महीने में विशेष रूप से तरावीह की नमाज भी पढ़ी जाती है।
उन्होंने बताया कि रमजान की सत्ताइसवीं रात को बेहद मुकद्दस माना जाता है, जिसे शब-ए-कद्र कहा जाता है। शब-ए-कद्र का अर्थ है वह रात जिसकी कद्र की जाए। इस रात की इबादत का दर्जा हजार रातों की इबादत के बराबर माना गया है और लोग पूरी रात जागकर अल्लाह की इबादत करते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार मो. इमरान ने कहा कि इस महीने में रोजा रखकर और सांसारिक इच्छाओं पर नियंत्रण रखकर खुदा को खुश किया जा सकता है। रोजा पारसी शब्द है और अरबी भाषा में इसे सियाम कहा जाता है। इसका अर्थ है परहेज करना और खुद को बुराइयों से दूर रखते हुए अल्लाह के हवाले कर देना।
उन्होंने कहा कि रोजा इसलिए फर्ज किया गया है ताकि इंसान को भूख और प्यास का महत्व समझ में आए और वह जरूरतमंदों की मदद कर सके। इस्लाम का पैगाम है कि अगर अल्लाह की सच्ची इबादत करनी है तो उसके सभी बंदों से प्यार करो और हमेशा उनकी मदद करो। रमजान के इस पवित्र महीने में मुस्लिम समाज के साथ-साथ हिंदू समुदाय के लोग भी दावत-ए-इफ्तार का आयोजन कर भाईचारे की मिसाल पेश करते हैं।


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