खिलते नन्हे बगीयों के फूलों पर जातिगत जहर के घोल का छिड़काव करती भारतीय राजनीति
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- Feb 04, 2026
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वरिष्ठ संवाददाता श्याम सुंदर पाण्डेय की लेखनी से
दुर्गावती(कैमूर)-- जिस देश में आने वाले भविष्य पर और वर्तमान भविष्य पर नन्हे अबोध बच्चों पर सामाजिक जहर के घोल का छिड़काव कर दिया जाए तो उस देश का भविष्य किस दिशा में जाएगा। जिस उम्र में ज्ञान और विज्ञान संस्कार और समरसता भेदभाव से ऊपर उठकर जीने की शिक्षा देनी है उसी उम्र में जातिगत जहर के घोल का छिड़काव कर कटुता नस नस में भर देना कहां की बुद्धिमता है। देश की एकता अखंडता को बचाए रखने के लिए समाज में समरसता माता-पिता के प्रति प्रेम वृद्धा आश्रम में कमी लाने की मुद्दे पर संस्कारिक शिक्षा देने की जगह नफरती कानून लागू कर दिए जाएं तो उसे देश का बचपन क्या सीखेगा और क्या विकास करेगा तथा उसे देश का भविष्य आने वाले भविष्य में कहां जाएगा इसकी चिंता राजनेताओं को नहीं है। लोकतंत्र में मत प्राप्त करना अच्छी बात है क्या मत प्राप्त करने के लिए इस देश के अबोध बच्चों को जातवादी जहर की आग में झोंक देना क्या संविधान इसकी अनुमति देता है। कटुता से भरी भारतीय लोकतंत्र के संवैधानिक ढांचे को ध्वस्त करने में कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं वर्तमान राजनीति में बैठे लोग। ऐसे गद्दारों को संविधान की आड़ में समरसता और जात पात की आग में झोंकने वालो को भारत का इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। यदि देश में नफरत फैलता है तो राजनीति भी इससे अछूती नहीं रहेगी जिसका परिणाम है चुनाव के समय लोगों को जातियों में बंटकर मतदान करना फिर भी आंखें नहीं खुल रही है। आंखें खुली है लोगों की लेकिन आंखों पर पट्टी बंधी है वोटो की इस अंधी राजनीति में अंधकार ही अंधकार दिखाई दे रहा है आने वाले भविष्य में। किसी ने सही कहा है अज्ञानी यदि सत्ता की कुर्सी पर बैठ जाए तो देश में विकास नहीं अंधकार ही छा देगा जो आज अक्षर सह दिखाई दे रहा है। इसलिए कम से कम बुद्धिजीवी वर्गों को देश के इन विषाक्त विषय मुद्दों पर चिंतन मनन करने की जरूरत है ताकि सामाजिक और पहल करने की जरूरत है ताकि देश को गर्त में जाने से बचाया जा सके। जहां एकता और समरसता की बात और शिक्षा देने की राजनीति होनी चाहिए वहां जातिगत जहर की आग जलाई जा रही है क्या देश को आगे ले जाने का यही है पैमाना।


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